श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.46

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

शाध्यस्मानीशितव्येश निष्पापान् कुरु नः प्रभो।

पुमान् यच्छ्रद्धयाऽऽतिष्ठंश्‍चोदनाया विमुच्यते॥ ४६

śādhyasmānīśitavyeśa niṣpāpān kuru naḥ prabho|

pumān yacchraddhayā''tiṣṭhaṃścodanāyā vimucyate|| 46

अर्थ

प्रभो! आप समस्त चराचर जगत‍्के नियन्ता और स्वामी हैं। आप हमें आज्ञा देकर निष्पाप बनाइये, हमारे पापोंका नाश कर दीजिये; क्योंकि जो पुरुष श्रद्धाके साथ आपकी आज्ञाका पालन करता है, वह विधि-निषेधके बन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ ४६॥

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