श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.54

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

अपाययत् स्तनं प्रीता सुतस्पर्शपरिप्लुता।

मोहिता मायया विष्णोर्यया सृष्टिः प्रवर्तते॥ ५४

apāyayat stanaṃ prītā sutasparśapariplutā|

mohitā māyayā viṣṇoryayā sṛṣṭiḥ pravartate|| 54

अर्थ

पुत्रोंके स्पर्शके आनन्दसे सराबोर एवं आनन्दित देवकीने उनको स्तन-पान कराया। वे विष्णुभगवान्‌की उस मायासे मोहित हो रही थीं, जिससे यह सृष्टि-चक्र चलता है॥ ५४॥✎ 1719

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1719 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: असुर-योनिमें → असुरयोनिमें

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