परीक्षित्! देवकीजीके स्तनोंका दूध साक्षात् अमृत था; क्यों न हो, भगवान् श्रीकृष्ण जो उसे पी चुके थे! उन बालकोंने वही अमृतमय दूध पिया। उस दूधके पीनेसे और भगवान् श्रीकृष्णके अंगोंका संस्पर्श होनेसे उन्हें आत्मसाक्षात्कार हो गया॥ ५५॥✎ 1719
पीत्वामृतं पयस्तस्याः पीतशेषं गदाभृतः।
नारायणांगसंस्पर्शप्रतिलब्धात्मदर्शनाः ॥ ५५
परीक्षित्! देवकीजीके स्तनोंका दूध साक्षात् अमृत था; क्यों न हो, भगवान् श्रीकृष्ण जो उसे पी चुके थे! उन बालकोंने वही अमृतमय दूध पिया। उस दूधके पीनेसे और भगवान् श्रीकृष्णके अंगोंका संस्पर्श होनेसे उन्हें आत्मसाक्षात्कार हो गया॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.85.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 659) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/85/55/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)