॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.86.29
सकुटुम्बो वहन् मूर्ध्ना पूजयांचक्र ईश्वरान्।
गन्धमाल्याम्बराकल्पधूपदीपार्घ्यगोवृषैः॥ २९
sakuṭumbo vahan mūrdhnā pūjayāṃcakra īśvarān|
gandhamālyāmbarākalpadhūpadīpārghyagovṛṣaiḥ|| 29
अर्थ
विदेहराज बहुलाश्व बड़े मनस्वी थे; उन्होंने यह देखकर कि दुष्ट-दुराचारी पुरुष जिनका नाम भी नहीं सुन सकते, वे ही भगवान् श्रीकृष्ण और ऋषि-मुनि मेरे घर पधारे हैं, सुन्दर-सुन्दर आसन मँगाये और भगवान् श्रीकृष्ण तथा ऋषि-मुनि आरामसे उनपर बैठ गये। उस समय बहुलाश्वकी विचित्र दशा थी। प्रेम-भक्तिके उद्रेकसे उनका हृदय भर आया था। नेत्रोंमें आँसू उमड़ रहे थे। उन्होंने अपने पूज्यतम अतिथियोंके चरणोंमें नमस्कार करके पाँव पखारे और अपने कुटुम्बके साथ उनके चरणोंका लोकपावन जल सिरपर धारण किया और फिर भगवान् एवं भगवत्स्वरूप ऋषियोंको गन्ध, माला, वस्त्र, अलंकार, धूप, दीप, अर्घ्य, गौ, बैल आदि समर्पित करके उनकी पूजा की॥ २७—२९॥