श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध) · अध्याय 86

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मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 660–667

श्लोक-सूची
पृष्ठ 660

ब्रह्मन् वेदितुमिच्छामः स्वसारं रामकृष्णयोः।

यथोपयेमे विजयो या ममासीत् पितामही॥ १10.86.1

राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! मेरे दादा अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीकी बहिन सुभद्राजीसे, जो मेरी दादी थीं, किस प्रकार विवाह किया? मैं यह जाननेके लिये बहुत उत्सुक हूँ॥ १॥

श्रीशुक उवाच

अर्जुनस्तीर्थयात्रायां पर्यटन्‍नवनीं प्रभुः।

गतः प्रभासमशृणोन्मातुलेयीं स आत्मनः॥ २ 10.86.2

दुर्योधनाय रामस्तां दास्यतीति न चापरे।

तल्लिप्सुः स यतिर्भूत्वा त्रिदण्डी द्वारकामगात्॥ ३10.86.3

तत्र वै वार्षिकान् मासानवात्सीत् स्वार्थसाधकः।

पौरैः सभाजितोऽभीक्ष्णं रामेणाजानता च सः॥ ४10.86.4

श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! एक बार अत्यन्त शक्तिशाली अर्जुन तीर्थयात्राके लिये पृथ्वीपर विचरण करते हुए प्रभासक्षेत्र पहुँचे। वहाँ उन्होंने यह सुना कि बलरामजी मेरे मामाकी पुत्री सुभद्राका विवाह दुर्योधनके साथ करना चाहते हैं और वसुदेव, श्रीकृष्ण आदि उनसे इस विषयमें सहमत नहीं हैं। अब अर्जुनके मनमें सुभद्राको पानेकी लालसा जग आयी। वे त्रिदण्डी वैष्णवका वेष धारण करके द्वारका पहुँचे॥ २-३॥ अर्जुन सुभद्राको प्राप्त करनेके लिये वहाँ वर्षाकालमें चार महीनेतक रहे। वहाँ पुरवासियों और बलरामजीने उनका खूब सम्मान किया। उन्हें यह पता न चला कि ये अर्जुन हैं॥ ४॥

एकदा गृहमानीय आतिथ्येन निमन्त्र्य तम्।✎ 2139

श्रद्धयोपहृतं भैक्ष्यं बलेन बुभुजे किल॥ ५10.86.5

सोऽपश्यत्तत्र महतीं कन्यां वीरमनोहराम्।

प्रीत्युत्फुल्लेक्षणस्तस्यां भा१वक्षुब्धं मनो दधे॥ ६10.86.6

सापि तं चकमे वीक्ष्य नारीणां हृदयंगमम्।

हसन्ती व्रीडितापांगी तन्‍न्यस्तहृदयेक्षणा॥ ७ 10.86.7

पृष्ठ 661

तां परं समनुध्यायन्‍नन्तरं प्रेप्सुरर्जुनः।

न लेभे शं भ्रमच्चित्तः कामेनातिबलीयसा॥ ८10.86.8

एक दिन बलरामजीने आतिथ्यके लिये उन्हें निमन्त्रित किया और उनको वे अपने घर ले आये। त्रिदण्डी-वेषधारी अर्जुनको बलरामजीने अत्यन्त श्रद्धाके साथ भोजन-सामग्री निवेदित की और उन्होंने बड़े प्रेमसे भोजन किया॥ ५॥ अर्जुनने भोजनके समय वहाँ विवाहयोग्य परम सुन्दरी सुभद्राको देखा। उसका सौन्दर्य बड़े-बड़े वीरोंका मन हरनेवाला था। अर्जुनके नेत्र प्रेमसे प्रफुल्लित हो गये। उनका मन उसे पानेकी आकांक्षासे क्षुब्ध हो गया और उन्होंने उसे पत्‍नी बनानेका दृढ़ निश्‍चय कर लिया॥ ६॥ परीक्षित्! तुम्हारे दादा अर्जुन भी बड़े ही सुन्दर थे। उनके शरीरकी गठन, भाव-भंगी स्त्रियोंका हृदय स्पर्श कर लेती थी। उन्हें देखकर सुभद्राने भी मनमें उन्हींको पति बनानेका निश्‍चय किया। वह तनिक मुसकराकर लजीली चितवनसे उनकी ओर देखने लगी। उसने अपना हृदय उन्हें समर्पित कर दिया॥ ७॥ अब अर्जुन केवल उसीका चिन्तन करने लगे और इस बातका अवसर ढूँढ़ने लगे कि इसे कब हर ले जाऊँ। सुभद्राको प्राप्त करनेकी उत्कट कामनासे उनका चित्त चक्कर काटने लगा, उन्हें तनिक भी शान्ति नहीं मिलती थी॥ ८॥

महत्यां देवयात्रायां रथस्थां दुर्गनिर्गताम्।

जहारानुमतः पित्रोः कृष्णस्य च महारथः॥ ९10.86.9

रथस्थो धनुरादाय शूरांश्‍चारुन्धतो भटान्।

विद्राव्य क्रोशतां स्वानां स्वभागं मृगराडिव॥ १०10.86.10

तच्छ्रुत्वा क्षुभितो रामः पर्वणीव महार्णवः।

गृहीतपादः कृष्णेन सुहृद्भिश्‍चान्वशाम्यत१॥ ११10.86.11

प्राहिणोत् पारिबर्हाणि वरवध्वोर्मुदा बलः।

महाधनोपस्करेभरथाश्‍वनरयोषितः ॥ १२10.86.12

पृष्ठ 661

एक बार सुभद्राजी देव-दर्शनके लिये रथपर सवार होकर द्वारका-दुर्गसे बाहर निकलीं। उसी समय महारथी अर्जुनने देवकी-वसुदेव और श्रीकृष्णकी अनुमतिसे सुभद्राका हरण कर लिया॥ ९॥ रथपर सवार होकर वीर अर्जुनने धनुष उठा लिया और जो सैनिक उन्हें रोकनेके लिये आये, उन्हें मार-पीटकर भगा दिया। सुभद्राके निज-जन रोते-चिल्लाते रह गये और अर्जुन जिस प्रकार सिंह अपना भाग लेकर चल देता है, वैसे ही सुभद्राको लेकर चल पड़े॥ १०॥ यह समाचार सुनकर बलरामजी बहुत बिगड़े। वे वैसे ही क्षुब्ध हो उठे, जैसे पूर्णिमाके दिन समुद्र। परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण तथा अन्य सुहृद्-सम्बन्धियोंने उनके पैर पकड़कर उन्हें बहुत कुछ समझाया-बुझाया, तब वे शान्त हुए॥ ११॥ इसके बाद बलरामजीने प्रसन्‍न होकर वर-वधूके लिये बहुत-सा धन, सामग्री, हाथी, रथ, घोड़े और दासी-दास दहेजमें भेजे॥ १२॥

पृष्ठ 660

श्रीशुक उवाच

कृष्णस्यासीद् द्विजश्रेष्ठः श्रुतदेव इति श्रुतः।

कृष्णैकभक्त्या पूर्णार्थः शान्तः कविरलम्पटः॥ १३10.86.13

स उवास विदेहेषु मिथिलायां गृहाश्रमी।

अनीहयाऽऽगताहार्यनिर्वर्तितनिजक्रियः ॥ १४10.86.14

यात्रामात्रं त्वहरहर्दैवादुपनमत्युत२।

नाधिकं तावता तुष्टः क्रियाश्‍चक्रे यथोचिताः॥ १५10.86.15

तथा तद्राष्ट्रपालोऽङ्ग बहुलाश्‍व इति श्रुतः।

मैथिलो निरहम्मान उभावप्यच्युतप्रियौ॥ १६10.86.16

पृष्ठ 661

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! विदेहकी राजधानी मिथिलामें एक गृहस्थ ब्राह्मण थे। उनका नाम था श्रुतदेव। वे भगवान् श्रीकृष्णके परम भक्त थे। वे एकमात्र भगवद्भक्तिसे ही पूर्णमनोरथ, परम शान्त, ज्ञानी और विरक्त थे॥ १३॥ वे गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी किसी प्रकारका उद्योग नहीं करते थे; जो कुछ मिल जाता, उसीसे अपना निर्वाह कर लेते थे॥ १४॥ प्रारब्धवश प्रतिदिन उन्हें जीवन-निर्वाहभरके लिये सामग्री मिल जाया करती थी, अधिक नहीं। वे उतनेसे ही सन्तुष्ट भी थे, और अपने वर्णाश्रमके अनुसार धर्म-पालनमें तत्पर रहते थे॥ १५॥ प्रिय परीक्षित्! उस देशके राजा भी ब्राह्मणके समान ही भक्तिमान् थे। मैथिलवंशके उन प्रतिष्ठित नरपतिका नाम था बहुलाश्‍व। उनमें अहंकारका लेश भी न था। श्रुतदेव और बहुलाश्‍व दोनों ही भगवान् श्रीकृष्णके प्यारे भक्त थे॥ १६॥

पृष्ठ 662

तयोः प्रसन्‍नो भगवान् दारुकेणाहृतं रथम्।

आरुह्य साकं मुनिभिर्विदेहान् प्रययौ प्रभुः॥ १७10.86.17

नारदो वामदेवोऽत्रिः कृष्णो रामोऽसितोऽरुणिः।

अहं बृहस्पतिः कण्वो मैत्रेयश्‍च्यवनादयः॥ १८ 10.86.18

तत्र तत्र तमायान्तं पौरा जानपदा नृप।

उपतस्थुः सार्घ्यहस्ता ग्रहैः सूर्यमिवोदितम्॥ १९ 10.86.19

आनर्तधन्वकुरुजांगलकंकमत्स्य-

पांचालकुन्तिमधुकेकयकोसलार्णाः।

अन्ये च तन्मुखसरोजमुदारहास-

स्निग्धेक्षणं नृप पपुर्दृशिभिर्नृनार्यः॥ २० 10.86.20

तेभ्यः स्ववीक्षणविनष्टतमिस्रदृग्भ्यः

क्षेमं त्रिलोकगुरुरर्थदृशं च यच्छन्।

शृण्वन् दिगन्तधवलं स्वयशोऽशुभघ्नं

गीतं सुरैर्नृभिरगाच्छनकैर्विदेहान्॥ २१10.86.21

पृष्ठ 662

एक बार भगवान् श्रीकृष्णने उन दोनोंपर प्रसन्‍न होकर दारुकसे रथ मँगवाया और उसपर सवार होकर द्वारकासे विदेह देशकी ओर प्रस्थान किया॥ १७॥ भगवान्‌के साथ नारद, वामदेव, अत्रि, वेदव्यास, परशुराम, असित, आरुणि, मैं (शुकदेव), बृहस्पति, कण्व, मैत्रेय, च्यवन आदि ऋषि भी थे॥ १८॥ परीक्षित्! वे जहाँ-जहाँ पहुँचते, वहाँ-वहाँकी नागरिक और ग्रामवासी प्रजा पूजाकी सामग्री लेकर उपस्थित होती। पूजा करनेवालोंको भगवान् ऐसे जान पड़ते, मानो ग्रहोंके साथ साक्षात् सूर्यनारायण उदय हो रहे हों॥ १९॥ परीक्षित्! उस यात्रामें आनर्त, धन्व, कुरुजांगल, कंक, मत्स्य, पांचाल, कुन्ति, मधु, केकय, कोसल, अर्ण आदि अनेक देशोंके नर-नारियोंने अपने नेत्ररूपी दोनोंसे भगवान् श्रीकृष्णके उन्मुक्त हास्य और प्रेमभरी चितवनसे युक्त मुखारविन्दके मकरन्द-रसका पान किया॥ २०॥ त्रिलोकगुरु भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे उन लोगोंकी अज्ञानदृष्टि नष्ट हो गयी। प्रभु-दर्शन करनेवाले नर-नारियोंको अपनी दृष्टिसे परम कल्याण और तत्त्वज्ञानका दान करते चल रहे थे। स्थान-स्थानपर मनुष्य और देवता भगवान्‌की उस कीर्तिका गान करके सुनाते, जो समस्त दिशाओंको उज्ज्वल बनानेवाली एवं समस्त अशुभोंका विनाश करनेवाली है। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण धीरे-धीरे विदेह देशमें पहुँचे॥ २१॥

तेऽच्युतं प्राप्तमाकर्ण्य पौरा जानपदा नृप।

अभीयुर्मुदितास्तस्मै गृहीतार्हणपाणयः॥ २२10.86.22

दृष्ट्वा त उत्तमश्‍लोकं प्रीत्युत्फुल्लाननाशयाः।

कैर्धृतांजलिभिर्नेमुः श्रुतपूर्वांस्तथा मुनीन्॥ २३10.86.23

स्वानुग्रहाय सम्प्राप्तं मन्वानौ तं जगद्गुरुम्।

मैथिलः श्रुतदेवश्‍च पादयोः पेततुः प्रभोः॥ २४10.86.24

परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके शुभागमनका समाचार सुनकर नागरिक और ग्रामवासियोंके आनन्दकी सीमा न रही। वे अपने हाथोंमें पूजाकी विविध सामग्रियाँ लेकर उनकी अगवानी करने आये॥ २२॥ भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करके उनके हृदय और मुखकमल प्रेम और आनन्दसे खिल उठे। उन्होंने भगवान्‌को तथा उन मुनियोंको, जिनका नाम केवल सुन रखा था, देखा न था—हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर प्रणाम किया॥ २३॥ मिथिलानरेश बहुलाश्‍व और श्रुतदेवने, यह समझकर कि जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण हम-लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही पधारे हैं, उनके चरणोंपर गिरकर प्रणाम किया॥ २४॥

पृष्ठ 663

न्यमन्त्रयेतां दाशार्हमातिथ्येन सह द्विजैः।

मैथिलः श्रुतदेवश्‍च युगपत् संहतांजली॥ २५10.86.25

पृष्ठ 663

बहुलाश्‍व और श्रुतदेव दोनोंने ही एक साथ हाथ जोड़कर मुनि-मण्डलीके सहित भगवान् श्रीकृष्णको आतिथ्य ग्रहण करनेके लिये निमन्त्रित किया॥ २५॥

भगवांस्तदभिप्रेत्य द्वयोः प्रियचिकीर्षया।

उभयोराविशद् गेहमुभाभ्यां तदलक्षितः॥ २६10.86.26

श्रोतुमप्यसतां दूरान् जनकः स्वगृहागतान्।

आनीतेष्वासनाग्र्येषु सुखासीनान् महामनाः॥ २७10.86.27

प्रवृद्धभक्त्या उद्धर्षहृदयास्राविलेक्षणः।

नत्वा तदङ्‌घ्रीन् प्रक्षाल्य तदपो लोकपावनीः॥ २८10.86.28

सकुटुम्बो वहन् मूर्ध्ना पूजयांचक्र ईश्‍वरान्।

गन्धमाल्याम्बराकल्पधूपदीपार्घ्यगोवृषैः॥ २९10.86.29

वाचा मधुरया प्रीणन्‍निदमाहान्‍नतर्पितान्।

पादावंकगतौ विष्णोः संस्पृशञ्छनकैर्मुदा॥ ३०10.86.30

भगवान् श्रीकृष्ण दोनोंकी प्रार्थना स्वीकार करके दोनोंको ही प्रसन्‍न करनेके लिये एक ही समय पृथक्-पृथक् रूपसे दोनोंके घर पधारे और यह बात एक-दूसरेको मालूम न हुई कि भगवान् श्रीकृष्ण मेरे घरके अतिरिक्त और कहीं भी जा रहे हैं॥ २६॥ विदेहराज बहुलाश्‍व बड़े मनस्वी थे; उन्होंने यह देखकर कि दुष्ट-दुराचारी पुरुष जिनका नाम भी नहीं सुन सकते, वे ही भगवान् श्रीकृष्ण और ऋषि-मुनि मेरे घर पधारे हैं, सुन्दर-सुन्दर आसन मँगाये और भगवान् श्रीकृष्ण तथा ऋषि-मुनि आरामसे उनपर बैठ गये। उस समय बहुलाश्‍वकी विचित्र दशा थी। प्रेम-भक्तिके उद्रेकसे उनका हृदय भर आया था। नेत्रोंमें आँसू उमड़ रहे थे। उन्होंने अपने पूज्यतम अतिथियोंके चरणोंमें नमस्कार करके पाँव पखारे और अपने कुटुम्बके साथ उनके चरणोंका लोकपावन जल सिरपर धारण किया और फिर भगवान् एवं भगवत्स्वरूप ऋषियोंको गन्ध, माला, वस्त्र, अलंकार, धूप, दीप, अर्घ्य, गौ, बैल आदि समर्पित करके उनकी पूजा की॥ २७—२९॥ जब सब लोग भोजन करके तृप्त हो गये, तब राजा बहुलाश्‍व भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंको अपनी गोदमें लेकर बैठ गये। और बड़े आनन्दसे धीरे-धीरे उन्हें सहलाते हुए बड़ी मधुर वाणीसे भगवान्‌की स्तुति करने लगे॥ ३०॥

राजोवाच

भवान् हि सर्वभूतानामात्मा साक्षी स्वदृग् विभो।

अथ नस्त्वत्पदाम्भोजं स्मरतां दर्शनं गतः॥ ३१10.86.31

स्ववचस्तदृतं कर्तुमस्मद‍्दृग्गोचरो भवान्।

यदात्थैकान्तभक्तान्मे नानन्तः श्रीरजः प्रियः॥ ३२10.86.32

राजा बहुलाश्‍वने कहा—‘प्रभो! आप समस्त प्राणियोंके आत्मा, साक्षी एवं स्वयंप्रकाश हैं। हम सदा-सर्वदा आपके चरणकमलोंका स्मरण करते रहते हैं। इसीसे आपने हमलोगोंको दर्शन देकर कृतार्थ किया है॥ ३१॥ भगवन्! आपके वचन हैं कि मेरा अनन्यप्रेमी भक्त मुझे अपने स्वरूप बलरामजी, अर्द्धांगिनी लक्ष्मी और पुत्र ब्रह्मासे भी बढ़कर प्रिय है। अपने उन वचनोंको सत्य करनेके लिये ही आपने हमलोगोंको दर्शन दिया है॥ ३२॥

पृष्ठ 664

को नु त्वच्चरणाम्भोजमेवंविद् विसृजेत् पुमान्।

निष्किंचनानां शान्तानां मुनीनां यस्त्वमात्मदः॥ ३३10.86.33

योऽवतीर्य यदोर्वंशे नृणां संसरतामिह।✎ 1202

यशो वितेने तच्छान्त्यै त्रैलोक्यवृजिनापहम्॥ ३४10.86.34

नमस्तुभ्यं भगवते कृष्णायाकुण्ठमेधसे।

नारायणाय ऋषये सुशान्तं तप ईयुषे॥ ३५10.86.35

दिनानि कतिचिद् भूमन् गृहान् नो निवस द्विजैः।

समेतः पादरजसा पुनीहीदं निमेः कुलम्॥ ३६10.86.36

इत्युपामन्त्रितो राज्ञा भगवाँल्लोकभावनः।

उवास कुर्वन् कल्याणं मिथिलानरयोषिताम्॥ ३७10.86.37

पृष्ठ 664

भला, ऐसा कौन पुरुष है, जो आपकी इस परम दयालुता और प्रेमपरवशताको जानकर भी आपके चरणकमलोंका परित्याग कर सके? प्रभो! जिन्होंने जगत‍्की समस्त वस्तुओंका एवं शरीर आदिका भी मनसे परित्याग कर दिया है, उन परम शान्त मुनियोंको आप अपनेतकको भी दे डालते हैं॥ ३३॥ आपने यदुवंशमें अवतार लेकर जन्म-मृत्युके चक्करमें पड़े हुए मनुष्योंको उससे मुक्त करनेके लिये जगत‍्में ऐसे विशुद्ध यशका विस्तार किया है, जो त्रिलोकीके पाप-तापको शान्त करनेवाला है॥ ३४॥ प्रभो! आप अचिन्त्य, अनन्त ऐश्‍वर्य और माधुर्यकी निधि हैं; सबके चित्तको अपनी ओर आकर्षित करनेके लिये आप सच्चिदानन्दस्वरूप परमब्रह्म हैं। आपका ज्ञान अनन्त है। परम शान्तिका विस्तार करनेके लिये आप ही नारायण ऋषिके रूपमें तपस्या कर रहे हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ३५॥ एकरस अनन्त! आप कुछ दिनोंतक मुनिमण्डलीके साथ हमारे यहाँ निवास कीजिये और अपने चरणोंकी धूलसे इस निमिवंशको पवित्र कीजिये’॥ ३६॥ परीक्षित्! सबके जीवनदाता भगवान् श्रीकृष्ण राजा बहुलाश्‍वकी यह प्रार्थना स्वीकार करके मिथिलावासी नर-नारियोंका कल्याण करते हुए कुछ दिनोंतक वहीं रहे॥ ३७॥

श्रुतदेवोऽच्युतं प्राप्तं स्वगृहांजनको यथा।

नत्वा मुनीन् सुसंहृष्टो धुन्वन् वासो ननर्त ह॥ ३८10.86.38

तृणपीठबृसीष्वेतानानीतेषूपवेश्य सः।

स्वागतेनाभिनन्द्याङ्‌घ्रीन् सभार्योऽवनिजे मुदा॥ ३९10.86.39

तदम्भसा महाभाग आत्मानं सगृहान्वयम्।

स्नापयांचक्र उद्धर्षो लब्धसर्वमनोरथः॥ ४०10.86.40

पृष्ठ 665

फलार्हणोशीरशिवामृताम्बुभि-

र्मृदा सुरभ्या तुलसीकुशाम्बुजैः।

आराधयामास यथोपपन्‍नया

सपर्यया सत्त्वविवर्धनान्धसा॥ ४१10.86.41

स तर्कयामास कुतो ममान्वभूद्

गृहान्धकूपे पतितस्य संगमः।

यः सर्वतीर्थास्पदपादरेणुभिः

कृष्णेन चास्यात्मनिकेतभूसुरैः॥ ४२10.86.42

सूपविष्टान् कृतातिथ्याञ्छ्रुतदेव उपस्थितः।

सभार्यस्वजनापत्य उवाचाङ्‌घ्र्यभिमर्शनः॥ ४३10.86.43✎ 2140

प्रिय परीक्षित्! जैसे राजा बहुलाश्‍व भगवान् श्रीकृष्ण और मुनि-मण्डलीके पधारनेपर आनन्दम‌ग्‍न हो गये थे, वैसे ही श्रुतदेव ब्राह्मण भी भगवान् श्रीकृष्ण और मुनियोंको अपने घर आया देखकर आनन्दविह्वल हो गये; वे उन्हें नमस्कार करके अपने वस्त्र उछाल-उछालकर नाचने लगे॥ ३८॥ श्रुतदेवने चटाई, पीढ़े और कुशासन बिछाकर उनपर भगवान् श्रीकृष्ण और मुनियोंको बैठाया, स्वागत-भाषण आदिके द्वारा उनका अभिनन्दन किया तथा अपनी पत्‍नीके साथ बड़े आनन्दसे सबके पाँव पखारे॥ ३९॥ परीक्षित्! महान् सौभाग्यशाली श्रुतदेवने भगवान् और ऋषियोंके चरणोदकसे अपने घर और कुटुम्बियोंको सींच दिया। इस समय उनके सारे मनोरथ पूर्ण हो गये थे। वे हर्षातिरेकसे मतवाले हो रहे थे॥ ४०॥ तदनन्तर उन्होंने फल, गन्ध, खससे सुवासित निर्मल एवं मधुर जल, सुगन्धित मिट्टी, तुलसी, कुश, कमल आदि अनायास-प्राप्त पूजा-सामग्री और सत्त्वगुण बढ़ानेवाले अन्‍नसे सबकी आराधना की॥ ४१॥ उस समय श्रुतदेवजी मन-ही-मन तर्कना करने लगे कि ‘मैं तो घर-गृहस्थीके अँधेरे कूएँमें गिरा हुआ हूँ, अभागा हूँ; मुझे भगवान् श्रीकृष्ण और उनके निवासस्थान ऋषि-मुनियोंका, जिनके चरणोंकी धूल ही समस्त तीर्थोंको तीर्थ बनानेवाली है, समागम कैसे प्राप्त हो गया?’॥ ४२॥ जब सब लोग आतिथ्य स्वीकार करके आरामसे बैठ गये, तब श्रुतदेव अपने स्त्री-पुत्र तथा अन्य सम्बन्धियोंके साथ उनकी सेवामें उपस्थित हुए। वे भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंका स्पर्श करते हुए कहने लगे॥ ४३॥

पृष्ठ 665

श्रुतदेव उवाच

नाद्य नो दर्शनं प्राप्तः परं परमपूरुषः।

यर्हीदं शक्तिभिः सृष्ट्वा प्रविष्टो ह्यात्मसत्तया॥ ४४10.86.44

यथा शयानः पुरुषो मनसैवात्ममायया।

सृष्ट्वा लोकं परं स्वाप्नमनुविश्यावभासते॥ ४५10.86.45

शृण्वतां गदतां शश्‍वदर्चतां त्वाभिवन्दताम्।

नृणां संवदतामन्तर्हृदि भास्यमलात्मनाम्॥ ४६10.86.46

हृदिस्थोऽप्यतिदूरस्थः कर्मविक्षिप्तचेतसाम्।

आत्मशक्तिभिरग्राह्योऽप्यन्त्युपेतगुणात्मनाम्॥ ४७10.86.47

पृष्ठ 666

नमोऽस्तु तेऽध्यात्मविदां परात्मने

अनात्मने स्वात्मविभक्तमृत्यवे।

सकारणाकारणलिंगमीयुषे

स्वमाययासंवृतरुद्धदृष्टये ॥ ४८10.86.48

स त्वं शाधि स्वभृत्यान् नः किं देव करवामहे।

एतदन्तो नृणां क्लेशो यद् भवानक्षिगोचरः॥ ४९10.86.49✎ 1203

श्रुतदेवने कहा—प्रभो! आप व्यक्त-अव्यक्तरूप प्रकृति और जीवोंसे परे पुरुषोत्तम हैं। मुझे आपने आज ही दर्शन दिया हो, ऐसी बात नहीं है। आप तो तभीसे सब लोगोंसे मिले हुए हैं, जबसे आपने अपनी शक्तियोंके द्वारा इस जगत‍्की रचना करके आत्मसत्ताके रूपमें इसमें प्रवेश किया है॥ ४४॥ जैसे सोया हुआ पुरुष स्वप्नावस्थामें अविद्यावश मन-ही-मन स्वप्न-जगत‍्की सृष्टि कर लेता है और उसमें स्वयं उपस्थित होकर अनेक रूपोंमें अनेक कर्म करता हुआ प्रतीत होता है, वैसे ही आपने अपनेमें ही अपनी मायासे जगत‍्की रचना कर ली है और अब इसमें प्रवेश करके अनेकों रूपोंसे प्रकाशित हो रहे हैं॥ ४५॥ जो लोग सर्वदा आपकी लीलाकथाका श्रवण-कीर्तन तथा आपकी प्रतिमाओंका अर्चन-वन्दन करते हैं और आपसमें आपकी ही चर्चा करते हैं, उनका हृदय शुद्ध हो जाता है और आप उसमें प्रकाशित हो जाते हैं॥ ४६॥ जिन लोगोंका चित्त लौकिक-वैदिक आदि कर्मोंकी वासनासे बहिर्मुख हो रहा है, उनके हृदयमें रहनेपर भी आप उनसे बहुत दूर हैं। किन्तु जिन लोगोंने आपके गुणगानसे अपने अन्तःकरणको सद्गुणसम्पन्‍न बना लिया है, उनके लिये चित्तवृत्तियोंसे अग्राह्य होनेपर भी आप अत्यन्त निकट हैं॥ ४७॥ प्रभो! जो लोग आत्मतत्त्वको जाननेवाले हैं, उनके आत्माके रूपमें ही आप स्थित हैं और जो शरीर आदिको ही अपना आत्मा मान बैठे हैं, उनके लिये आप अनात्माको प्राप्त होनेवाली मृत्युके रूपमें हैं। आप महत्तत्त्व आदि कार्यद्रव्य और प्रकृतिरूप कारणके नियामक हैं—शासक हैं। आपकी माया आपकी अपनी दृष्टिपर पर्दा नहीं डाल सकती, किन्तु उसने दूसरोंकी दृष्टिको ढक रखा है। आपको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ४८॥ स्वयंप्रकाश प्रभो! हम आपके सेवक हैं। हमें आज्ञा दीजिये कि हम आपकी क्या सेवा करें? नेत्रोंके द्वारा आपका दर्शन होनेतक ही जीवोंके क्लेश रहते हैं। आपके दर्शनमें ही समस्त क्लेशोंकी परिसमाप्ति है॥ ४९॥

पृष्ठ 666

श्रीशुक उवाच

तदुक्तमित्युपाकर्ण्य भगवान् प्रणतार्तिहा।

गृहीत्वा पाणिना पाणिं प्रहसंस्तमुवाच ह॥ ५०10.86.50

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शरणागतभयहारी भगवान् श्रीकृष्णने श्रुतदेवकी प्रार्थना सुनकर अपने हाथसे उनका हाथ पकड़ लिया और मुसकराते हुए कहा॥ ५०॥✎ 1720

श्रीभगवानुवाच

ब्रह्मंस्तेऽनुग्रहार्थाय सम्प्राप्तान् विद्ध्यमून् मुनीन्।

संचरन्ति मया लोकान् पुनन्तः पादरेणुभिः॥ ५१10.86.51

देवाः क्षेत्राणि तीर्थानि दर्शनस्पर्शनार्चनैः।

शनैः पुनन्ति कालेन तदप्यर्हत्तमेक्षया॥ ५२10.86.52

ब्राह्मणो जन्मना श्रेयान् सर्वेषां प्राणिनामिह।

तपसा विद्यया तुष्ट्या किमु मत्कलया युतः॥ ५३10.86.53

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्रिय श्रुतदेव! ये बड़े-बड़े ऋषि-मुनि तुमपर अनुग्रह करनेके लिये ही यहाँ पधारे हैं। ये अपने चरणकमलोंकी धूलसे लोगों और लोकोंको पवित्र करते हुए मेरे साथ विचरण कर रहे हैं॥ ५१॥ देवता, पुण्यक्षेत्र और तीर्थ आदि तो दर्शन, स्पर्श, अर्चन आदिके द्वारा धीरे-धीरे बहुत दिनोंमें पवित्र करते हैं; परन्तु संत पुरुष अपनी दृष्टिसे ही सबको पवित्र कर देते हैं। यही नहीं; देवता आदिमें जो पवित्र करनेकी शक्ति है, वह भी उन्हें संतोंकी दृष्टिसे ही प्राप्त होती है॥ ५२॥ श्रुतदेव! जगत‍्में ब्राह्मण जन्मसे ही सब प्राणियोंसे श्रेष्ठ हैं। यदि वह तपस्या, विद्या, सन्तोष और मेरी उपासना—मेरी भक्तिसे युक्त हो तब तो कहना ही क्या है॥ ५३॥

न ब्राह्मणान्मे दयितं रूपमेतच्चतुर्भुजम्।

सर्ववेदमयो विप्रः सर्वदेवमयो ह्यहम्॥ ५४10.86.54

दुष्प्रज्ञा अविदित्वैवमवजानन्त्यसूयवः।

गुरुं मां विप्रमात्मानमर्चादाविज्यदृष्टयः॥ ५५10.86.55

मुझे अपना यह चतुर्भुजरूप भी ब्राह्मणोंकी अपेक्षा अधिक प्रिय नहीं है। क्योंकि ब्राह्मण सर्ववेदमय है और मैं सर्वदेवमय हूँ॥ ५४॥ दुर्बुद्धि मनुष्य इस बातको न जानकर केवल मूर्ति आदिमें ही पूज्यबुद्धि रखते हैं और गुणोंमें दोष निकालकर मेरे स्वरूप जगद्गुरु ब्राह्मणका, जो कि उनका आत्मा ही है, तिरस्कार करते हैं॥ ५५॥

पृष्ठ 667

चराचरमिदं विश्‍वं भावा ये चास्य हेतवः।

मद्रूपाणीति चेतस्याधत्ते विप्रो मदीक्षया॥ ५६ 10.86.56

तस्माद् ब्रह्मऋषीनेतान् ब्रह्मन् मच्छ्रद्धयार्चय।

एवं चेदर्चितोऽस्म्यद्धा नान्यथा भूरिभूतिभिः॥ ५७10.86.57

पृष्ठ 667

ब्राह्मण मेरा साक्षात्कार करके अपने चित्तमें यह निश्‍चय कर लेता है कि यह चराचर जगत्, इसके सम्बन्धकी सारी भावनाएँ और इसके कारण प्रकृति-महत्तत्त्वादि सब-के-सब आत्मस्वरूप भगवान्‌के ही रूप हैं॥ ५६॥ इसलिये श्रुतदेव! तुम इन ब्रह्मर्षियोंको मेरा ही स्वरूप समझकर पूरी श्रद्धासे इनकी पूजा करो। यदि तुम ऐसा करोगे, तब तो तुमने साक्षात् अनायास ही मेरा पूजन कर लिया; नहीं तो बड़ी-बड़ी बहुमूल्य सामग्रियोंसे भी मेरी पूजा नहीं हो सकती॥ ५७॥

पृष्ठ 666

श्रीशुक उवाच

स इत्थं प्रभुणाऽऽदिष्टः सहकृष्णान् द्विजोत्तमान्।

आराध्यैकात्मभावेन मैथिलश्‍चाप सद्गतिम्॥ ५८10.86.58

एवं स्वभक्तयो राजन् भगवान् भक्तभक्तिमान्।

उषित्वाऽऽदिश्य सन्मार्गं पुनर्द्वारवतीमगात्॥ ५९10.86.59

पृष्ठ 667

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका यह आदेश प्राप्त करके श्रुतदेवने भगवान् श्रीकृष्ण और उन ब्रह्मर्षियोंकी एकात्मभावसे आराधना की तथा उनकी कृपासे वे भगवत्स्वरूपको प्राप्त हो गये। राजा बहुलाश्‍वने भी वही गति प्राप्त की॥ ५८॥ प्रिय परीक्षित्! जैसे भक्त भगवान्‌की भक्ति करते हैं, वैसे ही भगवान् भी भक्तोंकी भक्ति करते हैं। वे अपने दोनों भक्तोंको प्रसन्‍न करनेके लिये कुछ दिनोंतक मिथिलापुरीमें रहे और उन्हें साधु पुरुषोंके मार्गका उपदेश करके वे द्वारका लौट आये॥ ५९॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे
श्रुतदेवानुग्रहो नाम षडशीतितमोऽध्यायः॥ ८६॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    स्मरक्षु०।

    (मुद्रित पृष्ठ 660)
  2. १

    श्‍चानुसान्त्वितः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 661)
  3. २

    मत्ययम्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 661)

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