श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

सोऽपश्यत्तत्र महतीं कन्यां वीरमनोहराम्।

प्रीत्युत्फुल्लेक्षणस्तस्यां भा१वक्षुब्धं मनो दधे॥ ६

so'paśyattatra mahatīṃ kanyāṃ vīramanoharām|

prītyutphullekṣaṇastasyāṃ bhāvakṣubdhaṃ mano dadhe|| 6

अर्थ

अर्जुनने भोजनके समय वहाँ विवाहयोग्य परम सुन्दरी सुभद्राको देखा। उसका सौन्दर्य बड़े-बड़े वीरोंका मन हरनेवाला था। अर्जुनके नेत्र प्रेमसे प्रफुल्लित हो गये। उनका मन उसे पानेकी आकांक्षासे क्षुब्ध हो गया और उन्होंने उसे पत्‍नी बनानेका दृढ़ निश्‍चय कर लिया॥ ६॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    स्मरक्षु०।

    (मुद्रित पृष्ठ 660)

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