परीक्षित्! तुम्हारे दादा अर्जुन भी बड़े ही सुन्दर थे। उनके शरीरकी गठन, भाव-भंगी स्त्रियोंका हृदय स्पर्श कर लेती थी। उन्हें देखकर सुभद्राने भी मनमें उन्हींको पति बनानेका निश्चय किया। वह तनिक मुसकराकर लजीली चितवनसे उनकी ओर देखने लगी। उसने अपना हृदय उन्हें समर्पित कर दिया॥ ७॥
सापि तं चकमे वीक्ष्य नारीणां हृदयंगमम्।
हसन्ती व्रीडितापांगी तन्न्यस्तहृदयेक्षणा॥ ७
परीक्षित्! तुम्हारे दादा अर्जुन भी बड़े ही सुन्दर थे। उनके शरीरकी गठन, भाव-भंगी स्त्रियोंका हृदय स्पर्श कर लेती थी। उन्हें देखकर सुभद्राने भी मनमें उन्हींको पति बनानेका निश्चय किया। वह तनिक मुसकराकर लजीली चितवनसे उनकी ओर देखने लगी। उसने अपना हृदय उन्हें समर्पित कर दिया॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.86.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 660) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/86/7/