॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.86.39
तृणपीठबृसीष्वेतानानीतेषूपवेश्य सः।
स्वागतेनाभिनन्द्याङ्घ्रीन् सभार्योऽवनिजे मुदा॥ ३९
tṛṇapīṭhabṛsīṣvetānānīteṣūpaveśya saḥ|
svāgatenābhinandyāṅghrīn sabhāryo'vanije mudā|| 39
अर्थ
श्रुतदेवने चटाई, पीढ़े और कुशासन बिछाकर उनपर भगवान् श्रीकृष्ण और मुनियोंको बैठाया, स्वागत-भाषण आदिके द्वारा उनका अभिनन्दन किया तथा अपनी पत्नीके साथ बड़े आनन्दसे सबके पाँव पखारे॥ ३९॥