प्रभो! आप अचिन्त्य, अनन्त ऐश्वर्य और माधुर्यकी निधि हैं; सबके चित्तको अपनी ओर आकर्षित करनेके लिये आप सच्चिदानन्दस्वरूप परमब्रह्म हैं। आपका ज्ञान अनन्त है। परम शान्तिका विस्तार करनेके लिये आप ही नारायण ऋषिके रूपमें तपस्या कर रहे हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ३५॥
नमस्तुभ्यं भगवते कृष्णायाकुण्ठमेधसे।
नारायणाय ऋषये सुशान्तं तप ईयुषे॥ ३५
प्रभो! आप अचिन्त्य, अनन्त ऐश्वर्य और माधुर्यकी निधि हैं; सबके चित्तको अपनी ओर आकर्षित करनेके लिये आप सच्चिदानन्दस्वरूप परमब्रह्म हैं। आपका ज्ञान अनन्त है। परम शान्तिका विस्तार करनेके लिये आप ही नारायण ऋषिके रूपमें तपस्या कर रहे हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.86.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 664) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/86/35/