श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

नमस्तुभ्यं भगवते कृष्णायाकुण्ठमेधसे।

नारायणाय ऋषये सुशान्तं तप ईयुषे॥ ३५

namastubhyaṃ bhagavate kṛṣṇāyākuṇṭhamedhase|

nārāyaṇāya ṛṣaye suśāntaṃ tapa īyuṣe|| 35

अर्थ

प्रभो! आप अचिन्त्य, अनन्त ऐश्‍वर्य और माधुर्यकी निधि हैं; सबके चित्तको अपनी ओर आकर्षित करनेके लिये आप सच्चिदानन्दस्वरूप परमब्रह्म हैं। आपका ज्ञान अनन्त है। परम शान्तिका विस्तार करनेके लिये आप ही नारायण ऋषिके रूपमें तपस्या कर रहे हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ३५॥

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