जब सब लोग आतिथ्य स्वीकार करके आरामसे बैठ गये, तब श्रुतदेव अपने स्त्री-पुत्र तथा अन्य सम्बन्धियोंके साथ उनकी सेवामें उपस्थित हुए। वे भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंका स्पर्श करते हुए कहने लगे॥ ४३॥
सूपविष्टान् कृतातिथ्याञ्छ्रुतदेव उपस्थितः।
सभार्यस्वजनापत्य उवाचाङ्घ्र्यभिमर्शनः॥ ४३
जब सब लोग आतिथ्य स्वीकार करके आरामसे बैठ गये, तब श्रुतदेव अपने स्त्री-पुत्र तथा अन्य सम्बन्धियोंके साथ उनकी सेवामें उपस्थित हुए। वे भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंका स्पर्श करते हुए कहने लगे॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.86.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 665) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/86/43/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)