प्रिय परीक्षित्! उस देशके राजा भी ब्राह्मणके समान ही भक्तिमान् थे। मैथिलवंशके उन प्रतिष्ठित नरपतिका नाम था बहुलाश्व। उनमें अहंकारका लेश भी न था। श्रुतदेव और बहुलाश्व दोनों ही भगवान् श्रीकृष्णके प्यारे भक्त थे॥ १६॥
तथा तद्राष्ट्रपालोऽङ्ग बहुलाश्व इति श्रुतः।
मैथिलो निरहम्मान उभावप्यच्युतप्रियौ॥ १६
प्रिय परीक्षित्! उस देशके राजा भी ब्राह्मणके समान ही भक्तिमान् थे। मैथिलवंशके उन प्रतिष्ठित नरपतिका नाम था बहुलाश्व। उनमें अहंकारका लेश भी न था। श्रुतदेव और बहुलाश्व दोनों ही भगवान् श्रीकृष्णके प्यारे भक्त थे॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.86.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 661) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/86/16/