श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

तयोः प्रसन्‍नो भगवान् दारुकेणाहृतं रथम्।

आरुह्य साकं मुनिभिर्विदेहान् प्रययौ प्रभुः॥ १७

tayoḥ prasanno bhagavān dārukeṇāhṛtaṃ ratham|

āruhya sākaṃ munibhirvidehān prayayau prabhuḥ|| 17

अर्थ

एक बार भगवान् श्रीकृष्णने उन दोनोंपर प्रसन्‍न होकर दारुकसे रथ मँगवाया और उसपर सवार होकर द्वारकासे विदेह देशकी ओर प्रस्थान किया॥ १७॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें