श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

यात्रामात्रं त्वहरहर्दैवादुपनमत्युत२।

नाधिकं तावता तुष्टः क्रियाश्‍चक्रे यथोचिताः॥ १५

yātrāmātraṃ tvaharahardaivādupanamatyuta|

nādhikaṃ tāvatā tuṣṭaḥ kriyāścakre yathocitāḥ|| 15

अर्थ

प्रारब्धवश प्रतिदिन उन्हें जीवन-निर्वाहभरके लिये सामग्री मिल जाया करती थी, अधिक नहीं। वे उतनेसे ही सन्तुष्ट भी थे, और अपने वर्णाश्रमके अनुसार धर्म-पालनमें तत्पर रहते थे॥ १५॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    मत्ययम्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 661)

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