॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.86.55
दुष्प्रज्ञा अविदित्वैवमवजानन्त्यसूयवः।
गुरुं मां विप्रमात्मानमर्चादाविज्यदृष्टयः॥ ५५
duṣprajñā aviditvaivamavajānantyasūyavaḥ|
guruṃ māṃ vipramātmānamarcādāvijyadṛṣṭayaḥ|| 55
अर्थ
दुर्बुद्धि मनुष्य इस बातको न जानकर केवल मूर्ति आदिमें ही पूज्यबुद्धि रखते हैं और गुणोंमें दोष निकालकर मेरे स्वरूप जगद्गुरु ब्राह्मणका, जो कि उनका आत्मा ही है, तिरस्कार करते हैं॥ ५५॥