मुझे अपना यह चतुर्भुजरूप भी ब्राह्मणोंकी अपेक्षा अधिक प्रिय नहीं है। क्योंकि ब्राह्मण सर्ववेदमय है और मैं सर्वदेवमय हूँ॥ ५४॥
न ब्राह्मणान्मे दयितं रूपमेतच्चतुर्भुजम्।
सर्ववेदमयो विप्रः सर्वदेवमयो ह्यहम्॥ ५४
मुझे अपना यह चतुर्भुजरूप भी ब्राह्मणोंकी अपेक्षा अधिक प्रिय नहीं है। क्योंकि ब्राह्मण सर्ववेदमय है और मैं सर्वदेवमय हूँ॥ ५४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.86.54 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 666) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/86/54/