श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.50

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

तदुक्तमित्युपाकर्ण्य भगवान् प्रणतार्तिहा।

गृहीत्वा पाणिना पाणिं प्रहसंस्तमुवाच ह॥ ५०

taduktamityupākarṇya bhagavān praṇatārtihā|

gṛhītvā pāṇinā pāṇiṃ prahasaṃstamuvāca ha|| 50

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शरणागतभयहारी भगवान् श्रीकृष्णने श्रुतदेवकी प्रार्थना सुनकर अपने हाथसे उनका हाथ पकड़ लिया और मुसकराते हुए कहा॥ ५०॥✎ 1720

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1720 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: शरणागत-भयहारी → शरणागतभयहारी

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