प्रिय परीक्षित्! जैसे भक्त भगवान्की भक्ति करते हैं, वैसे ही भगवान् भी भक्तोंकी भक्ति करते हैं। वे अपने दोनों भक्तोंको प्रसन्न करनेके लिये कुछ दिनोंतक मिथिलापुरीमें रहे और उन्हें साधु पुरुषोंके मार्गका उपदेश करके वे द्वारका लौट आये॥ ५९॥
एवं स्वभक्तयो राजन् भगवान् भक्तभक्तिमान्।
उषित्वाऽऽदिश्य सन्मार्गं पुनर्द्वारवतीमगात्॥ ५९
प्रिय परीक्षित्! जैसे भक्त भगवान्की भक्ति करते हैं, वैसे ही भगवान् भी भक्तोंकी भक्ति करते हैं। वे अपने दोनों भक्तोंको प्रसन्न करनेके लिये कुछ दिनोंतक मिथिलापुरीमें रहे और उन्हें साधु पुरुषोंके मार्गका उपदेश करके वे द्वारका लौट आये॥ ५९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.86.59 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 667) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/86/59/