श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.59

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

एवं स्वभक्तयो राजन् भगवान् भक्तभक्तिमान्।

उषित्वाऽऽदिश्य सन्मार्गं पुनर्द्वारवतीमगात्॥ ५९

evaṃ svabhaktayo rājan bhagavān bhaktabhaktimān|

uṣitvā''diśya sanmārgaṃ punardvāravatīmagāt|| 59

अर्थ

प्रिय परीक्षित्! जैसे भक्त भगवान्‌की भक्ति करते हैं, वैसे ही भगवान् भी भक्तोंकी भक्ति करते हैं। वे अपने दोनों भक्तोंको प्रसन्‍न करनेके लिये कुछ दिनोंतक मिथिलापुरीमें रहे और उन्हें साधु पुरुषोंके मार्गका उपदेश करके वे द्वारका लौट आये॥ ५९॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे
श्रुतदेवानुग्रहो नाम षडशीतितमोऽध्यायः॥ ८६॥

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