श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

स्ववचस्तदृतं कर्तुमस्मद‍्दृग्गोचरो भवान्।

यदात्थैकान्तभक्तान्मे नानन्तः श्रीरजः प्रियः॥ ३२

svavacastadṛtaṃ kartumasmaddṛggocaro bhavān|

yadātthaikāntabhaktānme nānantaḥ śrīrajaḥ priyaḥ|| 32

अर्थ

भगवन्! आपके वचन हैं कि मेरा अनन्यप्रेमी भक्त मुझे अपने स्वरूप बलरामजी, अर्द्धांगिनी लक्ष्मी और पुत्र ब्रह्मासे भी बढ़कर प्रिय है। अपने उन वचनोंको सत्य करनेके लिये ही आपने हमलोगोंको दर्शन दिया है॥ ३२॥

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