श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.87.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 87 · अथ सप्ताशीतितमोऽध्यायः

न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधनादनुमितमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे।✎ 1540

अत उपमीयते द्रविणजातिविकल्पपथैर्वितथमनोविलासमृतमित्यवयन्त्यबुधाः॥ ३७✎ 1541

na yadidamagra āsa na bhaviṣyadato nidhanādanumitamantarā tvayi vibhāti mṛṣaikarase|

ata upamīyate draviṇajātivikalpapathairvitathamanovilāsamṛtamityavayantyabudhāḥ|| 37

अर्थ

भगवन्! वास्तविक बात तो यह है कि यह जगत् उत्पत्तिके पहले नहीं था और प्रलयके बाद नहीं रहेगा; इससे यह सिद्ध होता है कि यह बीचमें भी एकरस परमात्मामें मिथ्या ही प्रतीत हो रहा है। इसीसे हम श्रुतियाँ इस जगत‍्का वर्णन ऐसी उपमा देकर करती हैं कि जैसे मिट्टीमें घड़ा, लोहेमें शस्त्र और सोनेमें कुण्डल आदि नाममात्र हैं, वास्तवमें मिट्टी, लोहा और सोना ही हैं। वैसे ही परमात्मामें वर्णित जगत् नाममात्र है, सर्वथा मिथ्या और मनकी कल्पना है। इसे नासमझ मूर्ख ही सत्य मानते हैं†॥ ३७॥

टिप्पणियाँ

  1. †

    मुकुटकुण्डलकंकणकिंकिणीपरिणतं कनकं परमार्थतः।

    महदहङ्कृतिखप्रमुखं तथा नरहरे न परं परमार्थतः॥ २४॥

    सोना मुकुट, कुण्डल, कंकण और किंकिणीके रूपमें परिणत होनेपर भी वस्तुतः सोना ही है। इसी प्रकार नृसिंह! महत्तत्त्व, अहंकार और आकाश, वायु आदिके रूपमें उपलब्ध होनेवाला यह सम्पूर्ण जगत् वस्तुतः आपसे भिन्‍न नहीं है।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 683)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1540 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निधना- दनुमितमन्तरा → निधनादनुमितमन्तरा
  • #1541 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: द्रविणजातिविकल्पपथै- र्वितथमनोविलासमृतमित्यवयन्त्यबुधा:॥ → द्रविणजातिविकल्पपथैर्वितथमनोविलासमृतमित्यवयन्त्यबुधाः॥

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