श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.87.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 87 · अथ सप्ताशीतितमोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

स्वायम्भुव ब्रह्मसत्रं जनलोकेऽभवत् पुरा।

तत्रस्थानां मानसानां मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्॥ ९

svāyambhuva brahmasatraṃ janaloke'bhavat purā|

tatrasthānāṃ mānasānāṃ munīnāmūrdhvaretasām|| 9

अर्थ

भगवान् नारायणने कहा—नारदजी! प्राचीन कालकी बात है। एक बार जनलोकमें वहाँ रहनेवाले ब्रह्माके मानस पुत्र नैष्ठिक ब्रह्मचारी सनक, सनन्दन, सनातन आदि परमर्षियोंका ब्रह्मसत्र (ब्रह्मविषयक विचार या प्रवचन) हुआ था॥ ९॥

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