श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.88.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 88 · अथाष्टाशीतितमोऽध्यायः

यत्र नारायणः साक्षान्‍न्यासिनां परमा गतिः।

शान्तानां न्यस्तदण्डानां यतो नावर्तते गतः॥ २६

yatra nārāyaṇaḥ sākṣānnyāsināṃ paramā gatiḥ|

śāntānāṃ nyastadaṇḍānāṃ yato nāvartate gataḥ|| 26

अर्थ

वैकुण्ठमें स्वयं भगवान् नारायण निवास करते हैं। एकमात्र वे ही उन संन्यासियोंकी परम गति हैं जो सारे जगत‍्को अभयदान करके शान्तभावमें स्थित हो गये हैं। वैकुण्ठमें जाकर जीवको फिर लौटना नहीं पड़ता॥ २६॥✎ 1723

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1723 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वैकुण्ठ-लोकमें → वैकुण्ठलोकमें

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