श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध) · अध्याय 88

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मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 688–693

श्लोक-सूची
पृष्ठ 688

देवासुरमनुष्येषु ये भजन्त्यशिवं शिवम्।

प्रायस्ते धनिनो भोजा न तु लक्ष्म्याः पतिं हरिम्॥ १10.88.1

एतद् वेदितुमिच्छामः सन्देहोऽत्र महान् हि नः।

विरुद्धशीलयोः प्रभ्वोर्विरुद्धा भजतां गतिः॥ २10.88.2

राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! भगवान् शंकरने समस्त भोगोंका परित्याग कर रखा है; परन्तु देखा यह जाता है कि जो देवता, असुर अथवा मनुष्य उनकी उपासना करते हैं, वे प्रायः धनी और भोगसम्पन्‍न हो जाते हैं। और भगवान् विष्णु लक्ष्मीपति हैं, परन्तु उनकी उपासना करनेवाले प्रायः धनी और भोग सम्पन्‍न नहीं होते॥ १॥ दोनों प्रभु त्याग और भोगकी दृष्टिसे एक-दूसरेसे विरुद्ध स्वभाववाले हैं, परंतु उनके उपासकोंको उनके स्वरूपके विपरीत फल मिलता है। मुझे इस विषयमें बड़ा सन्देह है कि त्यागीकी उपासनासे भोग और लक्ष्मीपतिकी उपासनासे त्याग कैसे मिलता है? मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ॥ २॥

श्रीशुक उवाच

शिवः शक्तियुतः शश्‍वत् त्रिलिंगो गुणसंवृतः।

वैकारिकस्तैजसश्‍च तामसश्‍चेत्यहं त्रिधा॥ ३10.88.3

ततो विकारा अभवन् षोडशामीषु कंचन।

उपधावन् विभूतीनां सर्वासामश्‍नुते गतिम्॥ ४10.88.4

हरिर्हि निर्गुणः साक्षात् पुरुषः प्रकृतेः परः।

स सर्वदृगुपद्रष्टा तं भजन् निर्गुणो भवेत्॥ ५10.88.5

निवृत्तेष्वश्‍वमेधेषु राजा युष्मत्पितामहः।

शृण्वन् भगवतो धर्मानपृच्छदिदमच्युतम्॥ ६10.88.6

स आह भगवांस्तस्मै प्रीतः शुश्रूषवे प्रभुः।

नृणां निःश्रेयसार्थाय योऽवतीर्णो यदोः कुले॥ ७10.88.7

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शिवजी सदा अपनी शक्तिसे युक्त रहते हैं। वे सत्त्व आदि गुणोंसे युक्त तथा अहंकारके अधिष्ठाता हैं। अहंकारके तीन भेद हैं—वैकारिक, तैजस और तामस॥ ३॥ त्रिविध अहंकारसे सोलह विकार हुए—दस इन्द्रियाँ, पाँच महाभूत और एक मन। अतः इन सबके अधिष्ठातृ-देवताओंमेंसे किसी एककी उपासना करनेपर समस्त ऐश्‍वर्योंकी प्राप्ति हो जाती है॥ ४॥ परन्तु परीक्षित्! भगवान् श्रीहरि तो प्रकृतिसे परे स्वयं पुरुषोत्तम एवं प्राकृत गुणरहित हैं। वे सर्वज्ञ तथा सबके अन्तःकरणोंके साक्षी हैं। जो उनका भजन करता है, वह स्वयं भी गुणातीत हो जाता है॥ ५॥ परीक्षित्! जब तुम्हारे दादा धर्मराज युधिष्ठिर अश्‍वमेध यज्ञ कर चुके, तब भगवान्‌से विविध प्रकारके धर्मोंका वर्णन सुनते समय उन्होंने भी यही प्रश्‍न किया था॥ ६॥ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सर्वशक्तिमान् परमेश्‍वर हैं। मनुष्योंके कल्याणके लिये ही उन्होंने यदुवंशमें अवतार धारण किया था। राजा युधिष्ठिरका प्रश्‍न सुनकर और उनकी सुननेकी इच्छा देखकर उन्होंने प्रसन्‍नतापूर्वक इस प्रकार उत्तर दिया था॥ ७॥✎ 896

पृष्ठ 689

श्रीभगवानुवाच

पृष्ठ 689

यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनैः।

ततोऽधनं त्यजन्त्यस्य स्वजना दुःखदुःखितम्॥ ८10.88.8

स यदा वितथोद्योगो निर्विण्णः स्याद् धनेहया।

मत्परैः कृतमैत्रस्य करिष्ये मदनुग्रहम्॥ ९10.88.9

तद‍्ब्रह्म परमं सूक्ष्मं चिन्मात्रं सदनन्तकम्।

अतो मां सुदुराराध्यं हित्वान्यान् भजते जनः॥ १०10.88.10

ततस्त आशुतोषेभ्यो लब्धराज्यश्रियोद्धताः।

मत्ताः प्रमत्ता वरदान् विस्मरन्त्यवजानते॥ ११10.88.11

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—राजन्! जिसपर मैं कृपा करता हूँ, उसका सब धन धीरे-धीरे छीन लेता हूँ। जब वह निर्धन हो जाता है, तब उसके सगे-सम्बन्धी उसके दुःखाकुल चित्तकी परवा न करके उसे छोड़ देते हैं॥ ८॥ फिर वह धनके लिये उद्योग करने लगता है, तब मैं उसका वह प्रयत्‍न भी निष्फल कर देता हूँ। इस प्रकार बार-बार असफल होनेके कारण जब धन कमानेसे उसका मन विरक्त हो जाता है, उसे दुःख समझकर वह उधरसे अपना मुँह मोड़ लेता है और मेरे प्रेमी भक्तोंका आश्रय लेकर उनसे मेल-जोल करता है, तब मैं उसपर अपनी अहैतुक कृपाकी वर्षा करता हूँ॥ ९॥ मेरी कृपासे उसे परम सूक्ष्म अनन्त सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। इस प्रकार मेरी प्रसन्‍नता, मेरी आराधना बहुत कठिन है। इसीसे साधारण लोग मुझे छोड़कर मेरे ही दूसरे रूप अन्यान्य देवताओंकी आराधना करते हैं॥ १०॥ दूसरे देवता आशुतोष हैं। वे झटपट पिघल पड़ते हैं और अपने भक्तोंको साम्राज्य-लक्ष्मी दे देते हैं। उसे पाकर वे उच्छृंखल, प्रमादी और उन्मत्त हो उठते हैं और अपने वरदाता देवताओंको भी भूल जाते हैं तथा उनका तिरस्कार कर बैठते हैं॥ ११॥

पृष्ठ 688

श्रीशुक उवाच

शापप्रसादयोरीशा ब्रह्मविष्णुशिवादयः।

सद्यःशापप्रसादोऽङ्ग शिवो ब्रह्मा न चाच्युतः॥ १२10.88.12

अत्र चोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।

वृकासुराय गिरिशो वरं दत्त्वाऽऽप संकटम्॥ १३10.88.13

वृको नामासुरः पुत्रः शकुनेः पथि नारदम्।

दृष्ट्वाऽऽशुतोषं पप्रच्छ देवेषु त्रिषु दुर्मतिः॥ १४10.88.14

स आह देवं गिरिशमुपाधावाशु सिद्ध्यसि।

योऽल्पाभ्यां गुणदोषाभ्यामाशु तुष्यति कुप्यति॥ १५ 10.88.15

पृष्ठ 690

दशास्यबाणयोस्तुष्टः स्तुवतोर्वन्दिनोरिव।

ऐश्‍वर्यमतुलं दत्त्वा तत आप सुसंकटम्॥ १६10.88.16

पृष्ठ 689

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! ब्रह्मा, विष्णु और महादेव—ये तीनों शाप और वरदान देनेमें समर्थ हैं; परन्तु इनमें महादेव और ब्रह्मा शीघ्र ही प्रसन्‍न या रुष्ट होकर वरदान अथवा शाप दे देते हैं। परन्तु विष्णु भगवान् वैसे नहीं हैं॥ १२॥ इस विषयमें महात्मालोग एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। भगवान् शंकर एक बार वृकासुरको वर देकर संकटमें पड़ गये थे॥ १३॥ परीक्षित्! वृकासुर शकुनिका पुत्र था। उसकी बुद्धि बहुत बिगड़ी हुई थी। एक दिन कहीं जाते समय उसने देवर्षि नारदको देख लिया और उनसे पूछा कि ‘तीनों देवताओंमें झटपट प्रसन्‍न होनेवाला कौन है?’॥ १४॥ परीक्षित्! देवर्षि नारदने कहा—‘तुम भगवान् शंकरकी आराधना करो। इससे तुम्हारा मनोरथ बहुत जल्दी पूरा हो जायगा। वे थोड़े ही गुणोंसे शीघ्र-से-शीघ्र प्रसन्‍न और थोड़े ही अपराधसे तुरन्त क्रोध कर बैठते हैं॥ १५॥ रावण और बाणासुरने केवल वंदीजनोंके समान शंकरजीकी कुछ स्तुतियाँ की थीं। इसीसे वे उनपर प्रसन्‍न हो गये और उन्हें अतुलनीय ऐश्‍वर्य दे दिया। बादमें रावणके कैलास उठाने और बाणासुरके नगरकी रक्षाका भार लेनेसे वे उनके लिये संकटमें भी पड़ गये थे’॥ १६॥

इत्यादिष्टस्तमसुर उपाधावत् स्वगात्रतः।

केदार आत्मक्रव्येण जुह्वानोऽग्‍निमुखं हरम्॥ १७10.88.17

देवोपलब्धिमप्राप्य निर्वेदात् सप्तमेऽहनि।

शिरोऽवृश्‍चत् स्वधितिना तत्तीर्थक्लिन्‍नमूर्धजम्॥ १८10.88.18

तदा महाकारुणिकः स धूर्जटि-

र्यथा वयं चाग्‍निरिवोत्थितोऽनलात्।

निगृह्य दोर्भ्यां भुजयोर्न्यवारयत्

तत्स्पर्शनाद् भूय उपस्कृताकृतिः॥ १९10.88.19

तमाह चांगालमलं वृणीष्व मे

यथाभिकामं वितरामि ते वरम्।

प्रीयेय तोयेन नृणां प्रपद्यता- ✎ 1205

महो त्वयाऽऽत्मा भृशमर्द्यते वृथा॥ २०10.88.20

देवं स वव्रे पापीयान् वरं भूतभयावहम्।

यस्य यस्य करं शीर्ष्णि धास्ये स म्रियतामिति॥ २१10.88.21

तच्छ्रुत्वा भगवान् रुद्रो दुर्मना इव भारत।

ओमिति प्रहसंस्तस्मै ददेऽहेरमृतं यथा॥ २२10.88.22

पृष्ठ 690

नारदजीका उपदेश पाकर वृकासुर केदारक्षेत्रमें गया और अग्‍निको भगवान् शंकरका मुख मानकर अपने शरीरका मांस काट-काटकर उसमें हवन करने लगा॥ १७॥ इस प्रकार छः दिनतक उपासना करनेपर भी जब उसे भगवान् शंकरके दर्शन न हुए, तब उसे बड़ा दुःख हुआ। सातवें दिन केदारतीर्थमें स्नान करके उसने अपने भीगे बालवाले मस्तकको कुल्हाड़ेसे काटकर हवन करना चाहा॥ १८॥ परीक्षित्! जैसे जगत‍्में कोई दुःखवश आत्महत्या करने जाता है तो हमलोग करुणावश उसे बचा लेते हैं, वैसे ही परम दयालु भगवान् शंकरने वृकासुरके आत्मघातके पहले ही अग्‍निकुण्डसे अग्‍निदेवके समान प्रकट होकर अपने दोनों हाथोंसे उसके दोनों हाथ पकड़ लिये और गला काटनेसे रोक दिया। उनका स्पर्श होते ही वृकासुरके अंग ज्यों-के-त्यों पूर्ण हो गये॥ १९॥ भगवान् शंकरने वृकासुरसे कहा—‘प्यारे वृकासुर! बस करो, बस करो; बहुत हो गया। मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ। तुम मुँहमाँगा वर माँग लो। अरे भाई! मैं तो अपने शरणागत भक्तोंपर केवल जल चढ़ानेसे ही सन्तुष्ट हो जाया करता हूँ। भला, तुम झूठ-मूठ अपने शरीरको क्यों पीड़ा दे रहे हो?’॥ २०॥ परीक्षित्! अत्यन्त पापी वृकासुरने समस्त प्राणियोंको भयभीत करनेवाला यह वर माँगा कि ‘मैं जिसके सिरपर हाथ रख दूँ, वही मर जाय’॥ २१॥ परीक्षित्! उसकी यह याचना सुनकर भगवान् रुद्र पहले तो कुछ अनमने-से हो गये, फिर हँसकर कह दिया—‘अच्छा, ऐसा ही हो।’ ऐसा वर देकर उन्होंने मानो साँपको अमृत पिला दिया॥ २२॥

पृष्ठ 691

इत्युक्तः सोऽसुरो नूनं गौरीहरणलालसः।

स तद्वरपरीक्षार्थं शम्भोर्मूर्ध्नि किलासुरः।

स्वहस्तं धातुमारेभे सोऽबिभ्यत् स्वकृताच्छिवः॥ २३10.88.23

तेनोपसृष्टः संत्रस्तः पराधावन् सवेपथुः।

यावदन्तं दिवो भूमेः काष्ठानामुदगादुदक्॥ २४10.88.24

अजानन्तः प्रतिविधिं तूष्णीमासन् सुरेश्‍वराः।

ततो वैकुण्ठमगमद् भास्वरं तमसः परम्॥ २५10.88.25

यत्र नारायणः साक्षान्‍न्यासिनां परमा गतिः।

शान्तानां न्यस्तदण्डानां यतो नावर्तते गतः॥ २६10.88.26

तं तथाव्यसनं दृष्ट्वा भगवान् वृजिनार्दनः।

दूरात् प्रत्युदियाद् भूत्वा वटुको योगमायया॥ २७10.88.27

मेखलाजिनदण्डाक्षैस्तेजसाग्‍निरिव ज्वलन्।

अभिवादयामास च तं कुशपाणिर्विनीतवत्॥ २८10.88.28

भगवान् शंकरके इस प्रकार कह देनेपर वृकासुरके मनमें यह लालसा हो आयी कि ‘मैं पार्वतीजीको ही हर लूँ।’ वह असुर शंकरजीके वरकी परीक्षाके लिये उन्हींके सिरपर हाथ रखनेका उद्योग करने लगा। अब तो शंकरजी अपने दिये हुए वरदानसे ही भयभीत हो गये॥ २३॥ वह उनका पीछा करने लगा और वे उससे डरकर काँपते हुए भागने लगे। वे पृथ्वी, स्वर्ग और दिशाओंके अन्ततक दौड़ते गये; परन्तु फिर भी उसे पीछा करते देखकर उत्तरकी ओर बढ़े॥ २४॥ बड़े-बड़े देवता इस संकटको टालनेका कोई उपाय न देखकर चुप रह गये। अन्तमें वे प्राकृतिक अंधकारसे परे परम प्रकाशमय वैकुण्ठलोकमें गये॥ २५॥ वैकुण्ठमें स्वयं भगवान् नारायण निवास करते हैं। एकमात्र वे ही उन संन्यासियोंकी परम गति हैं जो सारे जगत‍्को अभयदान करके शान्तभावमें स्थित हो गये हैं। वैकुण्ठमें जाकर जीवको फिर लौटना नहीं पड़ता॥ २६॥ भक्तभयहारी भगवान्‌ने देखा कि शंकरजी तो बड़े संकटमें पड़े हुए हैं। तब वे अपनी योगमायासे ब्रह्मचारी बनकर दूरसे ही धीरे-धीरे वृकासुरकी ओर आने लगे॥ २७॥ भगवान्‌ने मूँजकी मेखला, काला मृगचर्म, दण्ड और रुद्राक्षकी माला धारण कर रखी थी। उनके एक-एक अंगसे ऐसी ज्योति निकल रही थी, मानो आग धधक रही हो। वे हाथमें कुश लिये हुए थे। वृकासुरको देखकर उन्होंने बड़ी नम्रतासे झुककर प्रणाम किया॥ २८॥✎ 1723

पृष्ठ 691

श्रीभगवानुवाच

शाकुनेय भवान् व्यक्तं श्रान्तः किं दूरमागतः।

क्षणं विश्रम्यतां पुंस आत्मायं सर्वकामधुक्॥ २९10.88.29

ब्रह्मचारी-वेषधारी भगवान्‌ने कहा—शकुनि-नन्दन वृकासुरजी! आप स्पष्ट ही बहुत थके-से जान पड़ते हैं। आज आप बहुत दूरसे आ रहे हैं क्या? तनिक विश्राम तो कर लीजिये। देखिये, यह शरीर ही सारे सुखोंकी जड़ है। इसीसे सारी कामनाएँ पूरी होती हैं। इसे अधिक कष्ट न देना चाहिये॥ २९॥

यदि नः श्रवणायालं युष्मद‍्व्यवसितं विभो।

भण्यतां प्रायशः पुम्भिर्धृतैः स्वार्थान् समीहते॥ ३०10.88.30

आप तो सब प्रकारसे समर्थ हैं। इस समय आप क्या करना चाहते हैं? यदि मेरे सुननेयोग्य कोई बात हो तो बतलाइये। क्योंकि संसारमें देखा जाता है कि लोग सहायकोंके द्वारा बहुत-से काम बना लिया करते हैं॥ ३०॥

पृष्ठ 692

श्रीशुक उवाच

पृष्ठ 692

एवं भगवता पृष्टो वचसामृतवर्षिणा।

गतक्लमोऽब्रवीत्तस्मै यथापूर्वमनुष्ठितम्॥ ३१10.88.31

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्‌के एक-एक शब्दसे अमृत बरस रहा था। उनके इस प्रकार पूछनेपर पहले तो उसने तनिक ठहरकर अपनी थकावट दूर की; उसके बाद क्रमशः अपनी तपस्या, वरदान-प्राप्ति तथा भगवान् शंकरके पीछे दौड़नेकी बात शुरूसे कह सुनायी॥ ३१॥

पृष्ठ 691

श्रीभगवानुवाच

एवं चेत्तर्हि तद्वाक्यं न वयं श्रद्दधीमहि।

यो दक्षशापात् पैशाच्यं प्राप्तः प्रेतपिशाचराट्॥ ३२10.88.32

यदि वस्तत्र विश्रम्भो दानवेन्द्र जगद्गुरौ।

तर्ह्यंगाशु स्वशिरसि हस्तं न्यस्य प्रतीयताम्॥ ३३10.88.33

यद्यसत्यं वचः शम्भोः कथंचिद् दानवर्षभ।

तदैनं जह्यसद्वाचं न यद् वक्तानृतं पुनः॥ ३४10.88.34

इत्थं भगवतश्‍चित्रैर्वचोभिः स सुपेशलैः।

भिन्‍नधीर्विस्मृतः शीर्ष्णि स्वहस्तं कुमतिर्व्यधात्॥ ३५10.88.35

अथापतद् भिन्‍नशिरा वज्राहत इव क्षणात्।

जयशब्दो नमःशब्दः साधुशब्दोऽभवद् दिवि॥ ३६10.88.36

मुमुचुः पुष्पवर्षाणि हते पापे वृकासुरे।

देवर्षिपितृगन्धर्वा मोचितः संकटाच्छिवः॥ ३७10.88.37

मुक्तं गिरिशमभ्याह भगवान् पुरुषोत्तमः।

अहो देव महादेव पापोऽयं स्वेन पाप्मना॥ ३८10.88.38

हतः को नु महत्स्वीश जन्तुर्वै कृतकिल्बिषः।

क्षेमी स्यात् किमु विश्‍वेशे कृतागस्को जगद्गुरौ॥ ३९10.88.39

पृष्ठ 692

श्रीभगवान्‌ने कहा—‘अच्छा, ऐसी बात है? तब तो भाई! हम उसकी बातपर विश्‍वास नहीं करते। आप नहीं जानते हैं क्या? वह तो दक्ष प्रजापतिके शापसे पिशाचभावको प्राप्त हो गया है। आजकल वही प्रेतों और पिशाचोंका सम्राट् है॥ ३२॥ दानवराज! आप इतने बड़े होकर ऐसी छोटी-छोटी बातोंपर विश्‍वास कर लेते हैं? आप यदि अब भी उसे जगद्गुरु मानते हों और उसकी बातपर विश्‍वास करते हों तो झटपट अपने सिरपर हाथ रखकर परीक्षा कर लीजिये॥ ३३॥ दानव-शिरोमणे! यदि किसी प्रकार शंकरकी बात असत्य निकले तो उस असत्यवादीको मार डालिये, जिससे फिर कभी वह झूठ न बोल सके॥ ३४॥ परीक्षित्! भगवान्‌ने ऐसी मोहित करनेवाली अद्भुत और मीठी बात कही कि उसकी विवेक-बुद्धि जाती रही। उस दुर्बुद्धिने भूलकर अपने ही सिरपर हाथ रख लिया॥ ३५॥ बस, उसी क्षण उसका सिर फट गया और वह वहीं धरतीपर गिर पड़ा, मानो उसपर बिजली गिर पड़ी हो। उस समय आकाशमें देवतालोग ‘जय-जय, नमो नमः, साधु-साधु!’ के नारे लगाने लगे॥ ३६॥ पापी वृकासुरकी मृत्युसे देवता, ऋषि, पितर और गन्धर्व अत्यन्त प्रसन्‍न होकर पुष्पोंकी वर्षा करने लगे और भगवान् शंकर उस विकट संकटसे मुक्त हो गये॥ ३७॥ अब भगवान् पुरुषोत्तमने भयमुक्त शंकरजीसे कहा कि ‘देवाधिदेव! बड़े हर्षकी बात है कि इस दुष्टको इसके पापोंने ही नष्ट कर दिया। परमेश्‍वर! भला, ऐसा कौन प्राणी है जो महापुरुषोंका अपराध करके कुशलसे रह सके? फिर स्वयं जगद्गुरु विश्‍वेश्‍वर! आपका अपराध करके तो कोई सकुशल रह ही कैसे सकता है?’॥ ३८-३९॥

पृष्ठ 693

य एवमव्याकृतशक्त्युदन्वतः

परस्य साक्षात् परमात्मनो हरेः।

गिरित्रमोक्षं कथयेच्छृणोति वा

विमुच्यते संसृतिभिस्तथारिभिः॥ ४०10.88.40

पृष्ठ 693

भगवान् अनन्त शक्तियोंके समुद्र हैं। उनकी एक-एक शक्ति मन और वाणीकी सीमाके परे है। वे प्रकृतिसे अतीत स्वयं परमात्मा हैं। उनकी शंकरजीको संकटसे छुड़ानेकी यह लीला जो कोई कहता या सुनता है, वह संसारके बन्धनों और शत्रुओंके भयसे मुक्त हो जाता है॥ ४०॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे रुद्रमोक्षणं
नामाष्टाशीतितमोऽध्यायः॥ ८८॥

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