॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.88.36
अथापतद् भिन्नशिरा वज्राहत इव क्षणात्।
जयशब्दो नमःशब्दः साधुशब्दोऽभवद् दिवि॥ ३६
athāpatad bhinnaśirā vajrāhata iva kṣaṇāt|
jayaśabdo namaḥśabdaḥ sādhuśabdo'bhavad divi|| 36
अर्थ
बस, उसी क्षण उसका सिर फट गया और वह वहीं धरतीपर गिर पड़ा, मानो उसपर बिजली गिर पड़ी हो। उस समय आकाशमें देवतालोग ‘जय-जय, नमो नमः, साधु-साधु!’ के नारे लगाने लगे॥ ३६॥