॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.88.37
मुमुचुः पुष्पवर्षाणि हते पापे वृकासुरे।
देवर्षिपितृगन्धर्वा मोचितः संकटाच्छिवः॥ ३७
mumucuḥ puṣpavarṣāṇi hate pāpe vṛkāsure|
devarṣipitṛgandharvā mocitaḥ saṃkaṭācchivaḥ|| 37
अर्थ
पापी वृकासुरकी मृत्युसे देवता, ऋषि, पितर और गन्धर्व अत्यन्त प्रसन्न होकर पुष्पोंकी वर्षा करने लगे और भगवान् शंकर उस विकट संकटसे मुक्त हो गये॥ ३७॥