रावण और बाणासुरने केवल वंदीजनोंके समान शंकरजीकी कुछ स्तुतियाँ की थीं। इसीसे वे उनपर प्रसन्न हो गये और उन्हें अतुलनीय ऐश्वर्य दे दिया। बादमें रावणके कैलास उठाने और बाणासुरके नगरकी रक्षाका भार लेनेसे वे उनके लिये संकटमें भी पड़ गये थे’॥ १६॥
दशास्यबाणयोस्तुष्टः स्तुवतोर्वन्दिनोरिव।
ऐश्वर्यमतुलं दत्त्वा तत आप सुसंकटम्॥ १६
रावण और बाणासुरने केवल वंदीजनोंके समान शंकरजीकी कुछ स्तुतियाँ की थीं। इसीसे वे उनपर प्रसन्न हो गये और उन्हें अतुलनीय ऐश्वर्य दे दिया। बादमें रावणके कैलास उठाने और बाणासुरके नगरकी रक्षाका भार लेनेसे वे उनके लिये संकटमें भी पड़ गये थे’॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.88.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 690) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/88/16/