॥ श्रीहरिः ॥
इत्यादिष्टस्तमसुर उपाधावत् स्वगात्रतः।
केदार आत्मक्रव्येण जुह्वानोऽग्निमुखं हरम्॥ १७
ityādiṣṭastamasura upādhāvat svagātrataḥ|
kedāra ātmakravyeṇa juhvāno'gnimukhaṃ haram|| 17
अर्थ
नारदजीका उपदेश पाकर वृकासुर केदारक्षेत्रमें गया और अग्निको भगवान् शंकरका मुख मानकर अपने शरीरका मांस काट-काटकर उसमें हवन करने लगा॥ १७॥
इत्यादिष्टस्तमसुर उपाधावत् स्वगात्रतः।
केदार आत्मक्रव्येण जुह्वानोऽग्निमुखं हरम्॥ १७
नारदजीका उपदेश पाकर वृकासुर केदारक्षेत्रमें गया और अग्निको भगवान् शंकरका मुख मानकर अपने शरीरका मांस काट-काटकर उसमें हवन करने लगा॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.88.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 690) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/88/17/