परीक्षित्! देवर्षि नारदने कहा—‘तुम भगवान् शंकरकी आराधना करो। इससे तुम्हारा मनोरथ बहुत जल्दी पूरा हो जायगा। वे थोड़े ही गुणोंसे शीघ्र-से-शीघ्र प्रसन्न और थोड़े ही अपराधसे तुरन्त क्रोध कर बैठते हैं॥ १५॥
स आह देवं गिरिशमुपाधावाशु सिद्ध्यसि।
योऽल्पाभ्यां गुणदोषाभ्यामाशु तुष्यति कुप्यति॥ १५
परीक्षित्! देवर्षि नारदने कहा—‘तुम भगवान् शंकरकी आराधना करो। इससे तुम्हारा मनोरथ बहुत जल्दी पूरा हो जायगा। वे थोड़े ही गुणोंसे शीघ्र-से-शीघ्र प्रसन्न और थोड़े ही अपराधसे तुरन्त क्रोध कर बैठते हैं॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.88.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 689) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/88/15/