श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.88.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 88 · अथाष्टाशीतितमोऽध्यायः

स आह देवं गिरिशमुपाधावाशु सिद्ध्यसि।

योऽल्पाभ्यां गुणदोषाभ्यामाशु तुष्यति कुप्यति॥ १५

sa āha devaṃ giriśamupādhāvāśu siddhyasi|

yo'lpābhyāṃ guṇadoṣābhyāmāśu tuṣyati kupyati|| 15

अर्थ

परीक्षित्! देवर्षि नारदने कहा—‘तुम भगवान् शंकरकी आराधना करो। इससे तुम्हारा मनोरथ बहुत जल्दी पूरा हो जायगा। वे थोड़े ही गुणोंसे शीघ्र-से-शीघ्र प्रसन्‍न और थोड़े ही अपराधसे तुरन्त क्रोध कर बैठते हैं॥ १५॥

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