श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.88.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 88 · अथाष्टाशीतितमोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

एवं चेत्तर्हि तद्वाक्यं न वयं श्रद्दधीमहि।

यो दक्षशापात् पैशाच्यं प्राप्तः प्रेतपिशाचराट्॥ ३२

evaṃ cettarhi tadvākyaṃ na vayaṃ śraddadhīmahi|

yo dakṣaśāpāt paiśācyaṃ prāptaḥ pretapiśācarāṭ|| 32

अर्थ

श्रीभगवान्‌ने कहा—‘अच्छा, ऐसी बात है? तब तो भाई! हम उसकी बातपर विश्‍वास नहीं करते। आप नहीं जानते हैं क्या? वह तो दक्ष प्रजापतिके शापसे पिशाचभावको प्राप्त हो गया है। आजकल वही प्रेतों और पिशाचोंका सम्राट् है॥ ३२॥

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