शान्त, समचित्त, अकिंचन और सबको अभय देनेवाले साधु-मुनियोंकी वे ही एकमात्र परम गति हैं। ऐसा सारे शास्त्र कहते हैं॥ १७॥
मुनीनां न्यस्तदण्डानां शान्तानां समचेतसाम्।
अकिंचनानां साधूनां यमाहुः परमां गतिम्॥ १७
शान्त, समचित्त, अकिंचन और सबको अभय देनेवाले साधु-मुनियोंकी वे ही एकमात्र परम गति हैं। ऐसा सारे शास्त्र कहते हैं॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.89.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 695) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/89/17/