श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

त्रिविधाकृतयस्तस्य राक्षसा असुराः सुराः।

गुणिन्या मायया सृष्टाः सत्त्वं तत्तीर्थसाधनम्॥ १९

trividhākṛtayastasya rākṣasā asurāḥ surāḥ|

guṇinyā māyayā sṛṣṭāḥ sattvaṃ tattīrthasādhanam|| 19

अर्थ

भगवान्‌की गुणमयी मायाने राक्षस, असुर और देवता—उनकी ये तीन मूर्तियाँ बना दी हैं। इनमें सत्त्वमयी देवमूर्ति ही उनकी प्राप्तिका साधन है। वे स्वयं ही समस्त पुरुषार्थस्वरूप हैं॥ १९॥

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