श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! सरस्वती-तटके ऋषियोंने अपने लिये नहीं, मनुष्योंका संशय मिटानेके लिये ही ऐसी युक्ति रची थी। पुरुषोत्तम भगवान्के चरणकमलोंकी सेवा करके उन्होंने उनका परमपद प्राप्त किया॥ २०॥
एवं सारस्वता विप्रा नृणां संशयनुत्तये।
पुरुषस्य पदाम्भोजसेवया तद्गतिं गताः॥ २०
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! सरस्वती-तटके ऋषियोंने अपने लिये नहीं, मनुष्योंका संशय मिटानेके लिये ही ऐसी युक्ति रची थी। पुरुषोत्तम भगवान्के चरणकमलोंकी सेवा करके उन्होंने उनका परमपद प्राप्त किया॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.89.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 695) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/89/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1207 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां