श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

ब्राह्मण उवाच

संकर्षणो वासुदेवः प्रद्युम्‍नो धन्विनां वरः।

अनिरुद्धोऽप्रतिरथो न त्रातुं शक्‍नुवन्ति यत्॥ ३१

saṃkarṣaṇo vāsudevaḥ pradyumno dhanvināṃ varaḥ|

aniruddho'pratiratho na trātuṃ śaknuvanti yat|| 31

अर्थ

ब्राह्मणने कहा—अर्जुन! यहाँ बलरामजी, भगवान् श्रीकृष्ण, धनुर्धरशिरोमणि प्रद्युम्‍न, अद्वितीय योद्धा अनिरुद्ध भी जब मेरे बालकोंकी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं हैं; इन जगदीश्‍वरोंके लिये भी यह काम कठिन हो रहा है; तब तुम इसे कैसे करना चाहते हो? सचमुच यह तुम्हारी मूर्खता है। हम तुम्हारी इस बातपर बिलकुल विश्‍वास नहीं करते॥ ३१-३२॥

यह अर्थ श्लोक 31–32 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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