भगवन्! मैं समझता हूँ कि आप स्त्री-पुरुष अपने पुत्रोंकी मृत्युसे दीन हो रहे हैं। मैं आपकी सन्तानकी रक्षा करूँगा। यदि मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी न कर सका तो आगमें कूदकर जल मरूँगा और इस प्रकार मेरे पापका प्रायश्चित्त हो जायगा’॥ ३०॥✎ 897
अहं प्रजा वां भगवन् रक्षिष्ये दीनयोरिह।
अनिस्तीर्णप्रतिज्ञोऽग्निं प्रवेक्ष्ये हतकल्मषः॥ ३०
भगवन्! मैं समझता हूँ कि आप स्त्री-पुरुष अपने पुत्रोंकी मृत्युसे दीन हो रहे हैं। मैं आपकी सन्तानकी रक्षा करूँगा। यदि मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी न कर सका तो आगमें कूदकर जल मरूँगा और इस प्रकार मेरे पापका प्रायश्चित्त हो जायगा’॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.89.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 696) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/89/30/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)