श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

अहं प्रजा वां भगवन् रक्षिष्ये दीनयोरिह।

अनिस्तीर्णप्रतिज्ञोऽग्‍निं प्रवेक्ष्ये हतकल्मषः॥ ३०

ahaṃ prajā vāṃ bhagavan rakṣiṣye dīnayoriha|

anistīrṇapratijño'gniṃ pravekṣye hatakalmaṣaḥ|| 30

अर्थ

भगवन्! मैं समझता हूँ कि आप स्त्री-पुरुष अपने पुत्रोंकी मृत्युसे दीन हो रहे हैं। मैं आपकी सन्तानकी रक्षा करूँगा। यदि मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी न कर सका तो आगमें कूदकर जल मरूँगा और इस प्रकार मेरे पापका प्रायश्‍चित्त हो जायगा’॥ ३०॥✎ 897

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #897 शब्दोंके बीचका स्थान: २४॥जो → २४॥ जो

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