वहाँ उन्हें ब्राह्मणका बालक नहीं मिला। फिर वे शस्त्र लेकर क्रमशः इन्द्र, अग्नि, निर्ऋति, सोम, वायु और वरुण आदिकी पुरियोंमें, अतलादि नीचेके लोकोंमें, स्वर्गसे ऊपरके महर्लोकादिमें एवं अन्यान्य स्थानोंमें गये॥ ४४॥✎ 14451446
विप्रापत्यमचक्षाणस्तत ऐन्द्रीमगात् पुरीम्।
आग्नेयीं नैर्ऋतीं सौम्यां वायव्यां वारुणीमथ।
रसातलं नाकपृष्ठं धिष्ण्यान्यन्यान्युदायुधः॥ ४४
वहाँ उन्हें ब्राह्मणका बालक नहीं मिला। फिर वे शस्त्र लेकर क्रमशः इन्द्र, अग्नि, निर्ऋति, सोम, वायु और वरुण आदिकी पुरियोंमें, अतलादि नीचेके लोकोंमें, स्वर्गसे ऊपरके महर्लोकादिमें एवं अन्यान्य स्थानोंमें गये॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.89.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 697) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/89/44/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
#1208 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नैऋर्तीं → नैऋर्ऋतीं
#1209 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नैऋर्ऋतीं → नैर्ऋतीं
#1445 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति, → निऋर्ऋति,
#1446 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति, → निर्ऋति,