॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.89.8
शयानं श्रिय उत्संगे पदा वक्षस्यताडयत्।
तत उत्थाय भगवान् सह लक्ष्म्या सतां गतिः॥ ८
śayānaṃ śriya utsaṃge padā vakṣasyatāḍayat|
tata utthāya bhagavān saha lakṣmyā satāṃ gatiḥ|| 8
अर्थ
उस समय भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीकी गोदमें अपना सिर रखकर लेटे हुए थे। भृगुजीने जाकर उनके वक्षःस्थलपर एक लात कसकर जमा दी। भक्तवत्सल भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीके साथ उठ बैठे और झटपट अपनी शय्यासे नीचे उतरकर मुनिको सिर झुकाया, प्रणाम किया। भगवान्ने कहा—‘ब्रह्मन्! आपका स्वागत है, आप भले पधारे। इस आसनपर बैठकर कुछ क्षण विश्राम कीजिये। प्रभो! मुझे आपके शुभागमनका पता न था। इसीसे मैं आपकी अगवानी न कर सका। मेरा अपराध क्षमा कीजिये॥ ८-९॥