॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.89.9
स्वतल्पादवरुह्याथ ननाम शिरसा मुनिम्।
आह १ ते स्वागतं ब्रह्मन् निषीदात्रासने क्षणम्।
अजानतामागतान्२ वः क्षन्तुमर्हथ नः प्रभो॥ ९
svatalpādavaruhyātha nanāma śirasā munim|
āha te svāgataṃ brahman niṣīdātrāsane kṣaṇam|
ajānatāmāgatān vaḥ kṣantumarhatha naḥ prabho|| 9
अर्थ
उस समय भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीकी गोदमें अपना सिर रखकर लेटे हुए थे। भृगुजीने जाकर उनके वक्षःस्थलपर एक लात कसकर जमा दी। भक्तवत्सल भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीके साथ उठ बैठे और झटपट अपनी शय्यासे नीचे उतरकर मुनिको सिर झुकाया, प्रणाम किया। भगवान्ने कहा—‘ब्रह्मन्! आपका स्वागत है, आप भले पधारे। इस आसनपर बैठकर कुछ क्षण विश्राम कीजिये। प्रभो! मुझे आपके शुभागमनका पता न था। इसीसे मैं आपकी अगवानी न कर सका। मेरा अपराध क्षमा कीजिये॥ ८-९॥
टिप्पणियाँ
- १
अहो।
- २
मागमनं क्षन्तु०।