यह गोपिकानन्दन भगवान् अनन्यप्रेमी भक्तोंके लिये जितने सुलभ हैं, उतने देहाभिमानी कर्मकाण्डी एवं तपस्वियोंको तथा अपने स्वरूपभूत ज्ञानियोंके लिये भी नहीं हैं‡॥ २१॥✎ 14111412
नायं सुखापो भगवान् देहिनां गोपिकासुतः।
ज्ञानिनां चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह॥ २१
यह गोपिकानन्दन भगवान् अनन्यप्रेमी भक्तोंके लिये जितने सुलभ हैं, उतने देहाभिमानी कर्मकाण्डी एवं तपस्वियोंको तथा अपने स्वरूपभूत ज्ञानियोंके लिये भी नहीं हैं॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.9.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 188) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/9/21/
टिप्पणियाँ
‡
ज्ञानी पुरुष भी भक्ति करें तो उन्हें इन सगुण भगवान्की प्राप्ति हो सकती है, परन्तु बड़ी कठिनाईसे। ऊखल-बँधे भगवान् सगुण हैं, वे निर्गुण प्रेमीको कैसे मिलेंगे?