श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.9.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

नायं सुखापो भगवान् देहिनां गोपिकासुतः।

ज्ञानिनां चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह॥ २१

nāyaṃ sukhāpo bhagavān dehināṃ gopikāsutaḥ|

jñānināṃ cātmabhūtānāṃ yathā bhaktimatāmiha|| 21

अर्थ

यह गोपिकानन्दन भगवान् अनन्यप्रेमी भक्तोंके लिये जितने सुलभ हैं, उतने देहाभिमानी कर्मकाण्डी एवं तपस्वियोंको तथा अपने स्वरूपभूत ज्ञानियोंके लिये भी नहीं हैं‡॥ २१॥✎ 1411 1412

टिप्पणियाँ

  1. ‡

    ज्ञानी पुरुष भी भक्ति करें तो उन्हें इन सगुण भगवान्‌की प्राप्ति हो सकती है, परन्तु बड़ी कठिनाईसे। ऊखल-बँधे भगवान् सगुण हैं, वे निर्गुण प्रेमीको कैसे मिलेंगे?

     

    (मुद्रित पृष्ठ 188)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1411 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): माँके → माके
  • #1412 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): माँका → माका

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