श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.9.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

उलूखलाङ्‌घ्रेरुपरि व्यवस्थितं

मर्काय कामं ददतं शिचि स्थितम्।

हैयंगवं चौर्यविशंकितेक्षणं

निरीक्ष्य पश्‍चात् सुतमागमच्छनैः॥ ८

ulūkhalāṅghrerupari vyavasthitaṃ

markāya kāmaṃ dadataṃ śici sthitam|

haiyaṃgavaṃ cauryaviśaṃkitekṣaṇaṃ

nirīkṣya paścāt sutamāgamacchanaiḥ|| 8

अर्थ

इधर-उधर ढूँढ़नेपर पता चला कि श्रीकृष्ण एक उलटे हुए ऊखलपर खड़े हैं और छीकेपरका माखन ले-लेकर बंदरोंको खूब लुटा रहे हैं। उन्हें यह भी डर है कि कहीं मेरी चोरी खुल न जाय, इसलिये चौकन्‍ने होकर चारों ओर ताकते जाते हैं। यह देखकर यशोदा-रानी पीछेसे धीरे-धीरे उनके पास जा पहुँचीं†॥ ८॥✎ 1409 1410

टिप्पणियाँ

  1. †

    ‘मा! तुम अपनी गोदमें नहीं बैठाओगी तो मैं किसी खलकी गोदमें जा बैठूँगा’—यही सोचकर मानो श्रीकृष्ण उलटे ऊखलके ऊपर जा बैठे। उदार पुरुष भले ही खलोंकी संगतिमें जा बैठें, परन्तु उनका शील-स्वभाव बदलता नहीं है। ऊखलपर बैठकर भी वे बन्दरोंको माखन बाँटने लगे। सम्भव है रामावतारके प्रति जो कृतज्ञताका भाव उदय हुआ था, उसके कारण अथवा अभी-अभी क्रोध आ गया था, उसका प्रायश्‍चित्त करनेके लिये!

    श्रीकृष्णके नेत्र हैं ‘चौर्यविशंकित’ ध्यान करनेयोग्य। वैसे तो उनके ललित, कलित, छलित, बलित, चकित आदि अनेकों प्रकारके ध्येय नेत्र हैं, परन्तु ये प्रेमीजनोंके हृदयमें गहरी चोट करते हैं।

    (मुद्रित पृष्ठ 184)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1409 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): माँ → मा
  • #1410 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींकेपरका → छीकेपरका

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