श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.90.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 90 · अथ नवतितमोऽध्यायः

त्वं यक्ष्मणा बलवतासि गृहीत इन्दो

क्षीणस्तमो न निजदीधितिभिः क्षिणोषि।

कच्चिन्मुकुन्दगदितानि यथा वयं त्वं

विस्मृत्य भोः स्थगितगीरुपलक्ष्यसे नः॥ १८

tvaṃ yakṣmaṇā balavatāsi gṛhīta indo

kṣīṇastamo na nijadīdhitibhiḥ kṣiṇoṣi|

kaccinmukundagaditāni yathā vayaṃ tvaṃ

vismṛtya bhoḥ sthagitagīrupalakṣyase naḥ|| 18

अर्थ

चन्द्रदेव! तुम्हें बहुत बड़ा रोग राजयक्ष्मा हो गया है। इसीसे तुम इतने क्षीण हो रहे हो। अरे राम-राम, अब तुम अपनी किरणोंसे अँधेरा भी नहीं हटा सकते! क्या हमारी ही भाँति हमारे प्यारे श्यामसुन्दरकी मीठी-मीठी रहस्यकी बातें भूल जानेके कारण तुम्हारी बोलती बंद हो गयी है? क्या उसीकी चिन्तासे तुम मौन हो रहे हो?॥ १८॥

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