श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध) · अध्याय 90

50 श्लोक · एक-एक श्लोक पढ़ें →

मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 701–708

श्लोक-सूची
पृष्ठ 701

श्रीशुक उवाच

सुखं स्वपुर्यां निवसन् द्वारकायां श्रियः पतिः।

सर्वसंपत्समृद्धायां जुष्टायां वृष्णिपुंगवैः॥ १10.90.1

स्त्रीभिश्‍चोत्तमवेषाभिर्नवयौवनकान्तिभिः।

कन्दुकादिभिर्हर्म्येषु क्रीडन्तीभिस्तडिद‍्द्युभिः॥ २10.90.2

नित्यं संकुलमार्गायां मदच्युद्भिर्मतंगजैः।

स्वलंकृतैर्भटैरश्‍वै रथैश्‍च कनकोज्ज्वलैः॥ ३10.90.3

उद्यानोपवनाढ्यायां पुष्पितद्रुमराजिषु।

निर्विशद‍्भृंगविहगैर्नादितायां समन्ततः॥ ४10.90.4

रेमे षोडशसाहस्रपत्‍नीनामेकवल्लभः।

तावद्विचित्ररूपोऽसौ तद‍्गृहेषु महर्द्धिषु॥ ५10.90.5

प्रोत्फुल्लोत्पलकह्लारकुमुदाम्भोजरेणुभिः।

वासितामलतोयेषु कूजद‍्द्विजकुलेषु च॥ ६10.90.6

पृष्ठ 702

विजहार विगाह्याम्भो ह्रदिनीषु महोदयः।✎ 1210

कुचकुंकुमलिप्तांगः परिरब्धश्‍च योषिताम्॥ ७10.90.7

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! द्वारका-नगरीकी छटा अलौकिक थी। उसकी सड़कें, मद चूते हुए मतवाले हाथियों, सुसज्जित योद्धाओं, घोड़ों और स्वर्णमय रथोंकी भीड़से सदा-सर्वदा भरी रहती थीं। जिधर देखिये, उधर ही हरे-भरे उपवन और उद्यान लहरा रहे हैं। पाँत-के-पाँत वृक्ष फूलोंसे लदे हुए हैं। उनपर बैठकर भौंरे गुनगुना रहे हैं और तरह-तरहके पक्षी कलरव कर रहे हैं। वह नगरी सब प्रकारकी सम्पत्तियोंसे भरपूर थी। जगत‍्के श्रेष्ठ वीर यदुवंशी उसका सेवन करनेमें अपना सौभाग्य मानते थे। वहाँकी स्त्रियाँ सुन्दर वेष-भूषासे विभूषित थीं और उनके अंग-अंगसे जवानीकी छटा छिटकती रहती थी। वे जब अपने महलोंमें गेंद आदिके खेल खेलतीं और उनका कोई अंग कभी दीख जाता तो ऐसा जान पड़ता, मानो बिजली चमक रही है। लक्ष्मीपति भगवान्‌की यही अपनी नगरी द्वारका थी। इसीमें वे निवास करते थे। भगवान् श्रीकृष्ण सोलह हजारसे अधिक पत्‍नियोंके एकमात्र प्राणवल्लभ थे। उन पत्‍नियोंके अलग-अलग महल भी परम ऐश्‍वर्यसे सम्पन्‍न थे। जितनी पत्‍नियाँ थीं, उतने ही अद्भुत रूप धारण करके वे उनके साथ विहार करते थे॥ १—५॥ सभी पत्‍नियोंके महलोंमें सुन्दर-सुन्दर सरोवर थे। उनका निर्मल जल खिले हुए नीले, पीले, श्‍वेत, लाल आदि भाँति-भाँतिके कमलोंके परागसे मँहकता रहता था। उनमें झुंड-के-झुंड हंस, सारस आदि सुन्दर-सुन्दर पक्षी चहकते रहते थे। भगवान् श्रीकृष्ण उन जलाशयोंमें तथा कभी-कभी नदियोंके जलमें भी प्रवेश कर अपनी पत्‍नियोंके साथ जल-विहार करते थे। भगवान्‌के साथ विहार करनेवाली पत्‍नियाँ जब उन्हें अपने भुजपाशमें बाँध लेतीं, आलिंगन करतीं, तब भगवान्‌के श्रीअंगोंमें उनके वक्षःस्थलकी केसर लग जाती थी॥ ६-७॥ ✎ 1447 1448

उपगीयमानो गन्धर्वैर्मृदंगपणवानकान्।

वादयद्भिर्मुदा वीणां सूतमागधवन्दिभिः॥ ८ 10.90.8

पृष्ठ 702

उस समय गन्धर्व उनके यशका गान करने लगते और सूत, मागध एवं वन्दीजन बड़े आनन्दसे मृदंग, ढोल, नगारे और वीणा आदि बाजे बजाने लगते॥ ८॥

सिच्यमानोऽच्युतस्ताभिर्हसन्तीभिः स्म रेचकैः।

प्रतिसिञ्चन् विचिक्रीडे यक्षीभिर्यक्षराडिव॥ ९10.90.9

भगवान्‌की पत्‍नियाँ कभी-कभी हँसते-हँसते पिचकारियोंसे उन्हें भिगो देती थीं। वे भी उनको तर कर देते। इस प्रकार भगवान् अपनी पत्‍नियोंके साथ क्रीडा करते; मानो यक्षराज कुबेर यक्षिणियोंके साथ विहार कर रहे हों॥ ९॥

ताः क्लिन्‍नवस्त्रविवृतोरुकुचप्रदेशाः

सिंचन्त्य उद‍्धृतबृहत्कबरप्रसूनाः।

कान्तं स्म रेचकजिहीरषयोपगुह्य

जातस्मरोत्सवलसद्वदना विरेजुः॥ १०10.90.10

उस समय भगवान्‌की पत्‍नियोंके वक्षःस्थल और जंघा आदि अंग वस्त्रोंके भीग जानेके कारण उनमेंसे झलकने लगते। उनकी बड़ी-बड़ी चोटियों और जूड़ोंमेंसे गुँथे हुए फूल गिरने लगते, वे उन्हें भिगोते-भिगोते पिचकारी छीन लेनेके लिये उनके पास पहुँच जातीं और इसी बहाने अपने प्रियतमका आलिंगन कर लेतीं। उनके स्पर्शसे पत्‍नियोंके हृदयमें प्रेम-भावकी अभिवृद्धि हो जाती, जिससे उनका मुखकमल खिल उठता। ऐसे अवसरोंपर उनकी शोभा और भी बढ़ जाया करती॥ १०॥

कृष्णस्तु तत्स्तनविषज्जितकुंकुमस्रक्

क्रीडाभिषंगधुतकुन्तलवृन्दबन्धः।

सिंचन् मुहुर्युवतिभिः प्रतिषिच्यमानो

रेमे करेणुभिरिवेभपतिः परीतः॥ ११10.90.11

उस समय भगवान् श्रीकृष्णकी वनमाला उन रानियोंके वक्षःस्थलपर लगी हुई केसरके रंगसे रँग जाती। विहारमें अत्यन्त म‌ग्‍न हो जानेके कारण घुँघराली अलकें उन्मुक्त भावसे लहराने लगतीं। वे अपनी रानियोंको बार-बार भिगो देते और रानियाँ भी उन्हें सराबोर कर देतीं। भगवान् श्रीकृष्ण उनके साथ इस प्रकार विहार करते, मानो कोई गजराज हथिनियोंसे घिरकर उनके साथ क्रीड़ा कर रहा हो॥ ११॥

नटानां नर्तकीनां च गीतवाद्योपजीविनाम्।

क्रीडालंकारवासांसि कृष्णोऽदात्तस्य च स्त्रियः॥ १२10.90.12

भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी पत्‍नियाँ क्रीडा करनेके बाद अपने-अपने वस्त्राभूषण उतारकर उन नटों और नर्तकियोंको दे देते, जिनकी जीविका केवल गाना-बजाना ही है॥ १२॥

पृष्ठ 703

कृष्णस्यैवं विहरतो गत्यालापेक्षितस्मितैः।

नर्मक्ष्वेलिपरिष्वङ्गैः स्त्रीणां किल हृता धियः॥ १३10.90.13

ऊचुर्मुकुन्दैकधियोऽगिर उन्मत्तवज्जडम्।

चिन्तयन्त्योऽरविन्दाक्षं तानि मे गदतः शृणु॥ १४10.90.14

पृष्ठ 703

परीक्षित्! भगवान् इसी प्रकार उनके साथ विहार करते रहते। उनकी चाल-ढाल, बातचीत, चितवन-मुसकान, हास-विलास और आलिंगन आदिसे रानियोंकी चित्तवृत्ति उन्हींकी ओर खिंची रहती। उन्हें और किसी बातका स्मरण ही न होता॥ १३॥ परीक्षित्! रानियोंके जीवन-सर्वस्व, उनके एकमात्र हृदयेश्‍वर भगवान् श्रीकृष्ण ही थे। वे कमलनयन श्यामसुन्दरके चिन्तनमें ही इतनी म‌ग्‍न हो जातीं कि कई देरतक चुप हो रहतीं और फिर उन्मत्तके समान असम्बद्ध बातें कहने लगतीं। कभी-कभी तो भगवान् श्रीकृष्णकी उपस्थितिमें ही प्रेमोन्मादके कारण उनके विरहका अनुभव करने लगतीं। और न जाने क्या-क्या कहने लगतीं। मैं उनकी बात तुम्हें सुनाता हूँ॥ १४॥

महिष्य ऊचुः

कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा न शेषे

स्वपिति जगति रात्र्यामीश्‍वरो गुप्तबोधः।

वयमिव सखि कच्चिद् गाढनिर्भिन्‍नचेता

नलिननयनहासोदारलीलेक्षितेन ॥ १५10.90.15

रानियाँ कहतीं—अरी कुररी! अब तो बड़ी रात हो गयी है। संसारमें सब ओर सन्‍नाटा छा गया है। देख, इस समय स्वयं भगवान् अपना अखण्ड बोध छिपाकर सो रहे हैं और तुझे नींद ही नहीं आती? तू इस तरह रात-रातभर जगकर विलाप क्यों कर रही है? सखी! कहीं कमलनयन भगवान्‌के मधुर हास्य और लीलाभरी उदार (स्वीकृतिसूचक) चितवनसे तेरा हृदय भी हमारी ही तरह बिंध तो नहीं गया है?॥ १५॥

नेत्रे निमीलयसि नक्तमदृष्टबन्धु-

स्त्वं रोरवीषि करुणं बत चक्रवाकि।

दास्यं गता वयमिवाच्युतपादजुष्टां

किं वा स्रजं स्पृहयसे कबरेण वोढुम्॥ १६10.90.16

अरी चकवी! तूने रातके समय अपने नेत्र क्यों बंद कर लिये हैं? क्या तेरे पतिदेव कहीं विदेश चले गये हैं कि तू इस प्रकार करुण स्वरसे पुकार रही है? हाय-हाय! तब तो तू बड़ी दुःखिनी है। परन्तु हो-न-हो तेरे हृदयमें भी हमारे ही समान भगवान्‌की दासी होनेका भाव जग गया है। क्या अब तू उनके चरणोंपर चढ़ायी हुई पुष्पोंकी माला अपनी चोटियोंमें धारण करना चाहती है?॥ १६॥

भो भोः सदा निष्टनसे उदन्व-

न्‍नलब्धनिद्रोऽधिगतप्रजागरः ।

किं वा मुकुन्दापहृतात्मलाञ्छनः

प्राप्तां दशां त्वं च गतो दुरत्ययाम्॥ १७10.90.17

अहो समुद्र! तुम निरन्तर गरजते ही रहते हो। तुम्हें नींद नहीं आती क्या? जान पड़ता है तुम्हें सदा जागते रहनेका रोग लग गया है। परन्तु नहीं-नहीं, हम समझ गयीं, हमारे प्यारे श्यामसुन्दरने तुम्हारे धैर्य, गाम्भीर्य आदि स्वाभाविक गुण छीन लिये हैं। क्या इसीसे तुम हमारे ही समान ऐसी व्याधिके शिकार हो गये हो, जिसकी कोई दवा नहीं है?॥ १७॥

पृष्ठ 704

त्वं यक्ष्मणा बलवतासि गृहीत इन्दो

क्षीणस्तमो न निजदीधितिभिः क्षिणोषि।

कच्चिन्मुकुन्दगदितानि यथा वयं त्वं

विस्मृत्य भोः स्थगितगीरुपलक्ष्यसे नः॥ १८10.90.18

पृष्ठ 704

चन्द्रदेव! तुम्हें बहुत बड़ा रोग राजयक्ष्मा हो गया है। इसीसे तुम इतने क्षीण हो रहे हो। अरे राम-राम, अब तुम अपनी किरणोंसे अँधेरा भी नहीं हटा सकते! क्या हमारी ही भाँति हमारे प्यारे श्यामसुन्दरकी मीठी-मीठी रहस्यकी बातें भूल जानेके कारण तुम्हारी बोलती बंद हो गयी है? क्या उसीकी चिन्तासे तुम मौन हो रहे हो?॥ १८॥

किं त्वाचरितमस्माभिर्मलयानिल तेऽप्रियम्।

गोविन्दापांगनिर्भिन्‍ने हृदीरयसि नः स्मरम्॥ १९10.90.19

मलयानिल! हमने तेरा क्या बिगाड़ा है, जो तू हमारे हृदयमें कामका संचार कर रहा है? अरे तू नहीं जानता क्या? भगवान्‌की तिरछी चितवनसे हमारा हृदय तो पहलेसे ही घायल हो गया है॥ १९॥

मेघ श्रीमंस्त्वमसि दयितो यादवेन्द्रस्य नूनं

श्रीवत्सांकं वयमिव भवान् ध्यायति प्रेमबद्धः।

अत्युत्कण्ठः शबलहृदयोऽस्मद्विधो बाष्पधाराः

स्मृत्वा स्मृत्वा विसृजसि मुहुर्दुःखदस्तत्प्रसंगः॥ २०10.90.20

श्रीमन् मेघ! तुम्हारे शरीरका सौन्दर्य तो हमारे प्रियतम-जैसा ही है। अवश्य ही तुम यदुवंशशिरोमणि भगवान्‌के परम प्यारे हो। तभी तो तुम हमारी ही भाँति प्रेमपाशमें बँधकर उनका ध्यान कर रहे हो! देखो-देखो! तुम्हारा हृदय चिन्तासे भर रहा है, तुम उनके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित हो रहे हो! तभी तो बार-बार उनकी याद करके हमारी ही भाँति आँसूकी धारा बहा रहे हो। श्यामघन! सचमुच घनश्यामसे नाता जोड़ना घर बैठे पीड़ा मोल लेना है॥ २०॥

प्रियरावपदानि भाषसे

मृतसंजीविकयानया गिरा।

करवाणि किमद्य ते प्रियं

वद मे वल्गितकण्ठ कोकिल॥ २१ 10.90.21

न चलसि न वदस्युदारबुद्धे

क्षितिधर चिन्तयसे महान्तमर्थम्।

अपि बत वसुदेवनन्दनाङ्‌घ्रिं

वयमिव कामयसे स्तनैर्विधर्तुम्॥ २२10.90.22

री कोयल! तेरा गला बड़ा ही सुरीला है, मीठी बोली बोलनेवाले हमारे प्राणप्यारेके समान ही मधुर स्वरसे तू बोलती है। सचमुच तेरी बोलीमें सुधा घोली हुई है, जो प्यारेके विरहसे मरे हुए प्रेमियोंको जिलानेवाली है। तू ही बता, इस समय हम तेरा क्या प्रिय करें?॥ २१॥ प्रिय पर्वत! तुम तो बड़े उदार विचारके हो। तुमने ही पृथ्वीको भी धारण कर रखा है। न तुम हिलते-डोलते हो और न कुछ कहते-सुनते हो। जान पड़ता है कि किसी बड़ी बातकी चिन्तामें म‌ग्‍न हो रहे हो। ठीक है, ठीक है; हम समझ गयीं। तुम हमारी ही भाँति चाहते हो कि अपने स्तनोंके समान बहुत-से शिखरोंपर मैं भी भगवान् श्यामसुन्दरके चरण-कमल धारण करूँ॥ २२॥

पृष्ठ 705

शुष्यद‍्ध्रदाः कर्शिता बत सिन्धुपत्‍न्यः

सम्प्रत्यपास्तकमलश्रिय इष्टभर्तुः।

यद्वद् वयं मधुपतेः प्रणयावलोक-

मप्राप्य मुष्टहृदयाः पुरुकर्शिताः स्म॥ २३10.90.23

हंस स्वागतमास्यतां पिब पयो

ब्रूह्यंग शौरेः कथां

दूतं त्वां नु विदाम कच्चिदजितः

स्वस्त्यास्त उक्तं पुरा।

किं वा नश्‍चलसौहृदः स्मरति तं

कस्माद् भजामो वयं

क्षौद्रालापय कामदं श्रियमृते

सैवैकनिष्ठा स्त्रियाम्॥ २४10.90.24

पृष्ठ 705

समुद्रपत्‍नी नदियो! यह ग्रीष्म ऋतु है। तुम्हारे कुण्ड सूख गये हैं। अब तुम्हारे अंदर खिले हुए कमलोंका सौन्दर्य नहीं दीखता। तुम बहुत दुबली-पतली हो गयी हो। जान पड़ता है, जैसे हम अपने प्रियतम श्यामसुन्दरकी प्रेमभरी चितवन न पाकर अपना हृदय खो बैठी हैं और अत्यन्त दुबली-पतली हो गयी हैं, वैसे ही तुम भी मेघोंके द्वारा अपने प्रियतम समुद्रका जल न पाकर ऐसी दीन-हीन हो गयी हो॥ २३॥ हंस! आओ, आओ! भले आये, स्वागत है। आसनपर बैठो; लो, दूध पियो। प्रिय हंस! श्यामसुन्दरकी कोई बात तो सुनाओ। हम समझती हैं कि तुम उनके दूत हो। किसीके वशमें न होनेवाले श्यामसुन्दर सकुशल तो हैं न? अरे भाई! उनकी मित्रता तो बड़ी अस्थिर है, क्षणभंगुर है। एक बात तो बतलाओ, उन्होंने हमसे कहा था कि तुम्हीं हमारी परम प्रियतमा हो। क्या अब उन्हें यह बात याद है? जाओ, जाओ; हम तुम्हारी अनुनय-विनय नहीं सुनतीं। जब वे हमारी परवा नहीं करते, तो हम उनके पीछे क्यों मरें? क्षुद्रके दूत! हम उनके पास नहीं जातीं। क्या कहा? वे हमारी इच्छा पूर्ण करनेके लिये ही आना चाहते हैं, अच्छा! तब उन्हें तो यहाँ बुला लाना, हमसे बातें कराना, परन्तु कहीं लक्ष्मीको साथ न ले आना। तब क्या वे लक्ष्मीको छोड़कर यहाँ नहीं आना चाहते? यह कैसी बात है? क्या स्त्रियोंमें लक्ष्मी ही एक ऐसी हैं, जिनका भगवान्‌से अनन्य प्रेम है? क्या हममेंसे कोई एक भी वैसी नहीं है?॥ २४॥✎ 898

इतीदृशेन भावेन कृष्णे योगेश्‍वरेश्‍वरे।

क्रियमाणेन माधव्यो लेभिरे परमां गतिम्॥ २५ 10.90.25

श्रुतमात्रोऽपि यः स्त्रीणां प्रसह्याकर्षते मनः।

उरुगायोरुगीतो वा पश्यन्तीनां कुतः पुनः॥ २६10.90.26

परीक्षित्! श्रीकृष्ण-पत्‍नियाँ योगेश्‍वरेश्‍वर भगवान् श्रीकृष्णमें ऐसा ही अनन्य प्रेम-भाव रखती थीं। इसीसे उन्होंने परमपद प्राप्त किया॥ २५॥ भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाएँ अनेकों प्रकारसे अनेकों गीतोंद्वारा गान की गयी हैं। वे इतनी मधुर, इतनी मनोहर हैं कि उनके सुननेमात्रसे स्त्रियोंका मन बलात् उनकी ओर खिंच जाता है। फिर जो स्त्रियाँ उन्हें अपने नेत्रोंसे देखती थीं, उनके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है॥ २६॥

याः सम्पर्यचरन् प्रेम्णा पादसंवाहनादिभिः।

जगद्गुरुं भर्तृबुद्ध्या तासां किं वर्ण्यते तपः॥ २७10.90.27

जिन बड़भागिनी स्त्रियोंने जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णको अपना पति मानकर परम प्रेमसे उनके चरण-कमलोंको सहलाया, उन्हें नहलाया-धुलाया, खिलाया-पिलाया, तरह-तरहसे उनकी सेवा की, उनकी तपस्याका वर्णन तो भला, किया ही कैसे जा सकता है॥ २७॥

पृष्ठ 706

एवं वेदोदितं धर्ममनुतिष्ठन् सतां गतिः।

गृहं धर्मार्थकामानां मुहुश्‍चादर्शयत् पदम्॥ २८ 10.90.28

आस्थितस्य परं धर्मं कृष्णस्य गृहमेधिनाम्।

आसन् षोडशसाहस्रं महिष्यश्‍च शताधिकम्॥ २९ 10.90.29

तासां स्त्रीरत्‍नभूतानामष्टौ याः प्रागुदाहृताः।

रुक्मिणीप्रमुखा राजंस्तत्पुत्राश्‍चानुपूर्वशः॥ ३० 10.90.30

एकैकस्यां दश दश कृष्णोऽजीजनदात्मजान्।

यावत्य आत्मनो भार्या अमोघगतिरीश्‍वरः॥ ३१ 10.90.31

तेषामुद्दामवीर्याणामष्टादश महारथाः।

आसन्‍नुदारयशसस्तेषां नामानि मे शृणु॥ ३२ 10.90.32

प्रद्युम्‍नश्‍चानिरुद्धश्‍च दीप्तिमान् भानुरेव च।

साम्बो मधुर्बृहद्भानुश्‍चित्रभानुर्वृकोऽरुणः॥ ३३ 10.90.33

पुष्करो वेदबाहुश्‍च श्रुतदेवः सुनन्दनः।

चित्रबाहुर्विरूपश्‍च कविर्न्यग्रोध एव च॥ ३४ 10.90.34

एतेषामपि राजेन्द्र तनुजानां मधुद्विषः।

प्रद्युम्‍न आसीत् प्रथमः पितृवद् रुक्मिणीसुतः॥ ३५ 10.90.35

स रुक्मिणो दुहितरमुपयेमे महारथः।

तस्मात् सुतोऽनिरुद्धोऽभून्‍नागायुतबलान्वितः॥ ३६ 10.90.36

स चापि रुक्मिणः पौत्रीं दौहित्रो जगृहे ततः।

वज्रस्तस्याभवद् यस्तु मौसलादवशेषितः॥ ३७10.90.37

पृष्ठ 706

परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सत्पुरुषोंके एकमात्र आश्रय हैं। उन्होंने वेदोक्त धर्मका बार-बार आचरण करके लोगोंको यह बात दिखला दी कि घर ही धर्म, अर्थ और काम—साधनका स्थान है॥ २८॥ इसीलिये वे गृहस्थोचित श्रेष्ठ धर्मका आश्रय लेकर व्यवहार कर रहे थे। परीक्षित्! मैं तुमसे कह ही चुका हूँ कि उनकी रानियोंकी संख्या थी सोलह हजार एक सौ आठ॥ २९॥ उन श्रेष्ठ स्त्रियोंमेंसे रुक्मिणी आदि आठ पटरानियों और उनके पुत्रोंका तो मैं पहले ही क्रमसे वर्णन कर चुका हूँ॥ ३०॥ उनके अतिरिक्त भगवान् श्रीकृष्णकी और जितनी पत्‍नियाँ थीं, उनसे भी प्रत्येकके दस-दस पुत्र उत्पन्‍न किये। यह कोई आश्‍चर्यकी बात नहीं है। क्योंकि भगवान् सर्वशक्तिमान् और सत्यसंकल्प हैं॥ ३१॥ भगवान्‌के परम पराक्रमी पुत्रोंमें अठारह तो महारथी थे, जिनका यश सारे जगत‍्में फैला हुआ था। उनके नाम मुझसे सुनो॥ ३२॥ प्रद्युम्‍न, अनिरुद्ध, दीप्तिमान्, भानु, साम्ब, मधु, बृहद्भानु, चित्रभानु, वृक, अरुण, पुष्कर, वेदबाहु, श्रुतदेव, सुनन्दन, चित्रबाहु, विरूप, कवि और न्यग्रोध॥ ३३-३४॥ राजेन्द्र! भगवान् श्रीकृष्णके इन पुत्रोंमें भी सबसे श्रेष्ठ रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्‍नजी थे। वे सभी गुणोंमें अपने पिताके समान ही थे॥ ३५॥ महारथी प्रद्युम्‍नने रुक्मीकी कन्यासे अपना विवाह किया था। उसीके गर्भसे अनिरुद्धजीका जन्म हुआ। उनमें दस हजार हाथियोंका बल था॥ ३६॥ रुक्मीके दौहित्र अनिरुद्धजीने अपने नानाकी पोतीसे विवाह किया। उसके गर्भसे वज्रका जन्म हुआ। ब्राह्मणोंके शापसे पैदा हुए मूसलके द्वारा यदुवंशका नाश हो जानेपर एकमात्र वे ही बच रहे थे॥ ३७॥

प्रतिबाहुरभूत्तस्मात् सुबाहुस्तस्य चात्मजः।

सुबाहोः शान्तसेनोऽभूच्छतसेनस्तु तत्सुतः॥ ३८10.90.38

न ह्येतस्मिन् कुले जाता अधना अबहुप्रजाः।

अल्पायुषोऽल्पवीर्याश्‍च अब्रह्मण्याश्‍च जज्ञिरे॥ ३९10.90.39

वज्रके पुत्र हैं प्रतिबाहु, प्रतिबाहुके सुबाहु, सुबाहुके शान्तसेन और शान्तसेनके शतसेन॥ ३८॥ परीक्षित्! इस वंशमें कोई भी पुरुष ऐसा न हुआ जो बहुत-सी सन्तानवाला न हो तथा जो निर्धन, अल्पायु और अल्पशक्ति हो। वे सभी ब्राह्मणोंके भक्त थे॥ ३९॥

पृष्ठ 707

यदुवंशप्रसूतानां पुंसां विख्यातकर्मणाम्।

संख्या न शक्यते कर्तुमपि वर्षायुतैर्नृप॥ ४० 10.90.40

तिस्रः कोट्यः सहस्राणामष्टाशीतिशतानि च।

आसन् यदुकुलाचार्याः कुमाराणामिति श्रुतम्॥ ४१ 10.90.41

संख्यानं यादवानां कः करिष्यति महात्मनाम्।

यत्रायुतानामयुतलक्षेणास्ते स आहुकः॥ ४२10.90.42

देवासुराहवहता दैतेया ये सुदारुणाः।

ते चोत्पन्‍ना मनुष्येषु प्रजा दृप्ता बबाधिरे॥ ४३10.90.43

तन्‍निग्रहाय हरिणा प्रोक्ता देवा यदोः कुले।

अवतीर्णाः कुलशतं तेषामेकाधिकं नृप॥ ४४10.90.44

तेषां प्रमाणं भगवान् प्रभुत्वेनाभवद्धरिः।

ये चानुवर्तिनस्तस्य ववृधुः सर्वयादवाः॥ ४५10.90.45

शय्यासनाटनालापक्रीडास्नानादिकर्मसु ।

न विदुः सन्तमात्मानं वृष्णयः कृष्णचेतसः॥ ४६10.90.46

पृष्ठ 707

परीक्षित्! यदुवंशमें ऐसे-ऐसे यशस्वी और पराक्रमी पुरुष हुए हैं, जिनकी गिनती भी हजारों वर्षोंमें पूरी नहीं हो सकती॥ ४०॥ मैंने ऐसा सुना है कि यदुवंशके बालकोंको शिक्षा देनेके लिये तीन करोड़ अट्ठासी लाख आचार्य थे॥ ४१॥ ऐसी स्थितिमें महात्मा यदुवंशियोंकी संख्या तो बतायी ही कैसे जा सकती है! स्वयं महाराज उग्रसेनके साथ एक नील (१०००००००००००००) के लगभग सैनिक रहते थे॥ ४२॥ परीक्षित्! प्राचीन कालमें देवासुरसंग्रामके समय बहुत-से भयंकर असुर मारे गये थे। वे ही मनुष्योंमें उत्पन्‍न हुए और बड़े घमंडसे जनताको सताने लगे॥ ४३॥ उनका दमन करनेके लिये भगवान्‌की आज्ञासे देवताओंने ही यदुवंशमें अवतार लिया था। परीक्षित्! उनके कुलोंकी संख्या एक सौ एक थी॥ ४४॥ वे सब भगवान् श्रीकृष्णको ही अपना स्वामी एवं आदर्श मानते थे। जो यदुवंशी उनके अनुयायी थे, उनकी सब प्रकारसे उन्‍नति हुई॥ ४५॥ यदुवंशियोंका चित्त इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णमें लगा रहता था कि उन्हें सोने-बैठने, घूमने-फिरने, बोलने-खेलने और नहाने-धोने आदि कामोंमें अपने शरीरकी भी सुधि न रहती थी। वे जानते ही न थे कि हमारा शरीर क्या कर रहा है। उनकी समस्त शारीरिक क्रियाएँ यन्त्रकी भाँति अपने-आप होती रहती थीं॥ ४६॥

तीर्थं चक्रे नृपोनं यदजनि यदुषु स्वःसरित्पादशौचं

विद्विट्स्निग्धाः स्वरूपं ययुरजितपरा श्रीर्यदर्थेऽन्ययत्‍नः ।

यन्‍नामामंगलघ्नं श्रुतमथ गदितं यत्कृतो गोत्रधर्मः

पृष्ठ 708

कृष्णस्यैतन्‍न चित्रं क्षितिभरहरणं कालचक्रायुधस्य ॥ ४७10.90.47

जयति जननिवासो देवकीजन्मवादो

यदुवरपर्षत्स्वैर्दोर्भिरस्यन्‍नधर्मम्।

स्थिरचरवृजिनघ्नः सुस्मितश्रीमुखेन

व्रजपुरवनितानां वर्धयन् कामदेवम्॥ ४८10.90.48

परीक्षित्! भगवान्‌का चरणधोवन गंगाजी अवश्य ही समस्त तीर्थोंमें महान् एवं पवित्र हैं। परन्तु जब स्वयं परमतीर्थस्वरूप भगवान्‌ने ही यदुवंशमें अवतार ग्रहण किया, तब तो गंगाजलकी महिमा अपने-आप ही उनके सुयशतीर्थकी अपेक्षा कम हो गयी। भगवान्‌के स्वरूपकी यह कितनी बड़ी महिमा है कि उनसे प्रेम करनेवाले भक्त और द्वेष करनेवाले शत्रु दोनों ही उनके स्वरूपको प्राप्त हुए। जिस लक्ष्मीको प्राप्त करनेके लिये बड़े-बड़े देवता यत्‍न करते रहते हैं, वे ही भगवान्‌की सेवामें नित्य-निरन्तर लगी रहती हैं। भगवान्‌का नाम एक बार सुनने अथवा उच्चारण करनेसे ही सारे अमंगलोंको नष्ट कर देता है। ऋषियोंके वंशजोंमें जितने भी धर्म प्रचलित हैं, सबके संस्थापक भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं। वे अपने हाथमें कालस्वरूप चक्र लिये रहते हैं। परीक्षित्! ऐसी स्थितिमें वे पृथ्वीका भार उतार देते हैं, यह कौन बड़ी बात है॥ ४७॥ भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त जीवोंके आश्रयस्थान हैं। यद्यपि वे सदा-सर्वदा सर्वत्र उपस्थित ही रहते हैं, फिर भी कहनेके लिये उन्होंने देवकीजीके गर्भसे जन्म लिया है। यदुवंशी वीर पार्षदोंके रूपमें उनकी सेवा करते रहते हैं। उन्होंने अपने भुजबलसे अधर्मका अन्त कर दिया है। परीक्षित्! भगवान् स्वभावसे ही चराचर जगत‍्का दुःख मिटाते रहते हैं। उनका मन्द-मन्द मुसकानसे युक्त सुन्दर मुखारविन्द व्रजस्त्रियों और पुरस्त्रियोंके हृदयमें प्रेम-भावका संचार करता रहता है। वास्तवमें सारे जगत्पर वही विजयी हैं। उन्हींकी जय हो! जय हो!!॥ ४८॥ ✎ 1935

इत्थं परस्य निजवर्त्मरिरक्षयाऽऽत्त-

लीलातनोस्तदनुरूपविडम्बनानि।

कर्माणि कर्मकषणानि यदूत्तमस्य

श्रूयादमुष्य पदयोरनुवृत्तिमिच्छन्॥ ४९10.90.49

मर्त्यस्तयानुसवमेधितया मुकुन्द-

श्रीमत्कथाश्रवणकीर्तनचिन्तयैति।

तद्धाम दुस्तरकृतान्तजवापवर्गं

ग्रामाद् वनं क्षितिभुजोऽपि ययुर्यदर्थाः॥ ५०10.90.50

पृष्ठ 708

परीक्षित्! प्रकृतिसे अतीत परमात्माने अपने द्वारा स्थापित धर्म-मर्यादाकी रक्षाके लिये दिव्य लीला-शरीर ग्रहण किया और उसके अनुरूप अनेकों अद्भुत चरित्रोंका अभिनय किया। उनका एक-एक कर्म स्मरण करनेवालोंके कर्मबन्धनोंको काट डालनेवाला है। जो यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवाका अधिकार प्राप्त करना चाहे, उसे उनकी लीलाओंका ही श्रवण करना चाहिये॥ ४९॥ परीक्षित्! जब मनुष्य प्रतिक्षण भगवान् श्रीकृष्णकी मनोहारिणी लीला-कथाओंका अधिकाधिक श्रवण, कीर्तन और चिन्तन करने लगता है, तब उसकी यही भक्ति उसे भगवान्‌के परमधाममें पहुँचा देती है। यद्यपि कालकी गतिके परे पहुँच जाना बहुत ही कठिन है, परन्तु भगवान्‌के धाममें कालकी दाल नहीं गलती। वह वहाँतक पहुँच ही नहीं पाता। उसी धामकी प्राप्तिके लिये अनेक सम्राटोंने अपना राजपाट छोड़कर तपस्या करनेके उद्देश्यसे जंगलकी यात्रा की है। इसलिये मनुष्यको उनकी लीला-कथाका ही श्रवण करना चाहिये॥ ५०॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्र्यां पारमहंस्यां संहितायां
दशमस्कन्धे उत्तरार्धे श्रीकृष्णचरितानुवर्णनं नाम नवतितमोऽध्यायः॥ ९०॥

॥ इति दशमस्कन्धोत्तरार्धः सम्पूर्णः॥

श्रीकृष्णार्पणमस्तु

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें