श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.90.49

दशम स्कन्ध · अध्याय 90 · अथ नवतितमोऽध्यायः

इत्थं परस्य निजवर्त्मरिरक्षयाऽऽत्त-

लीलातनोस्तदनुरूपविडम्बनानि।

कर्माणि कर्मकषणानि यदूत्तमस्य

श्रूयादमुष्य पदयोरनुवृत्तिमिच्छन्॥ ४९

itthaṃ parasya nijavartmarirakṣayā''tta-

līlātanostadanurūpaviḍambanāni|

karmāṇi karmakaṣaṇāni yadūttamasya

śrūyādamuṣya padayoranuvṛttimicchan|| 49

अर्थ

परीक्षित्! प्रकृतिसे अतीत परमात्माने अपने द्वारा स्थापित धर्म-मर्यादाकी रक्षाके लिये दिव्य लीला-शरीर ग्रहण किया और उसके अनुरूप अनेकों अद्भुत चरित्रोंका अभिनय किया। उनका एक-एक कर्म स्मरण करनेवालोंके कर्मबन्धनोंको काट डालनेवाला है। जो यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवाका अधिकार प्राप्त करना चाहे, उसे उनकी लीलाओंका ही श्रवण करना चाहिये॥ ४९॥

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