॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.90.24
हंस स्वागतमास्यतां पिब पयो
ब्रूह्यंग शौरेः कथां
दूतं त्वां नु विदाम कच्चिदजितः
स्वस्त्यास्त उक्तं पुरा।
किं वा नश्चलसौहृदः स्मरति तं
कस्माद् भजामो वयं
क्षौद्रालापय कामदं श्रियमृते
सैवैकनिष्ठा स्त्रियाम्॥ २४
haṃsa svāgatamāsyatāṃ piba payo
brūhyaṃga śaureḥ kathāṃ
dūtaṃ tvāṃ nu vidāma kaccidajitaḥ
svastyāsta uktaṃ purā|
kiṃ vā naścalasauhṛdaḥ smarati taṃ
kasmād bhajāmo vayaṃ
kṣaudrālāpaya kāmadaṃ śriyamṛte
saivaikaniṣṭhā striyām|| 24
अर्थ
हंस! आओ, आओ! भले आये, स्वागत है। आसनपर बैठो; लो, दूध पियो। प्रिय हंस! श्यामसुन्दरकी कोई बात तो सुनाओ। हम समझती हैं कि तुम उनके दूत हो। किसीके वशमें न होनेवाले श्यामसुन्दर सकुशल तो हैं न? अरे भाई! उनकी मित्रता तो बड़ी अस्थिर है, क्षणभंगुर है। एक बात तो बतलाओ, उन्होंने हमसे कहा था कि तुम्हीं हमारी परम प्रियतमा हो। क्या अब उन्हें यह बात याद है? जाओ, जाओ; हम तुम्हारी अनुनय-विनय नहीं सुनतीं। जब वे हमारी परवा नहीं करते, तो हम उनके पीछे क्यों मरें? क्षुद्रके दूत! हम उनके पास नहीं जातीं। क्या कहा? वे हमारी इच्छा पूर्ण करनेके लिये ही आना चाहते हैं, अच्छा! तब उन्हें तो यहाँ बुला लाना, हमसे बातें कराना, परन्तु कहीं लक्ष्मीको साथ न ले आना। तब क्या वे लक्ष्मीको छोड़कर यहाँ नहीं आना चाहते? यह कैसी बात है? क्या स्त्रियोंमें लक्ष्मी ही एक ऐसी हैं, जिनका भगवान्से अनन्य प्रेम है? क्या हममेंसे कोई एक भी वैसी नहीं है?॥ २४॥✎ 898