श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.1.10

एकादश स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

बिभ्रद् वपुः सकलसुन्दरसन्‍निवेशं

कर्माचरन् भुवि सुमंगलमाप्तकामः।

आस्थाय धाम रममाण उदारकीर्तिः

संहर्तुमैच्छत कुलं स्थितकृत्यशेषः॥ १०

bibhrad vapuḥ sakalasundarasanniveśaṃ

karmācaran bhuvi sumaṃgalamāptakāmaḥ|

āsthāya dhāma ramamāṇa udārakīrtiḥ

saṃhartumaicchata kulaṃ sthitakṛtyaśeṣaḥ|| 10

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—भगवान् श्रीकृष्णने वह शरीर धारण करके जिसमें सम्पूर्ण सुन्दर पदार्थोंका सन्‍निवेश था (नेत्रोंमें मृगनयन, कन्धोंमें सिंहस्कन्ध, करोंमें करि-कर, चरणोंमें कमल आदिका विन्यास था।) पृथ्वीमें मंगलमय कल्याणकारी कर्मोंका आचरण किया। वे पूर्णकाम प्रभु द्वारकाधाममें रहकर क्रीडा करते रहे और उन्होंने अपनी उदार कीर्तिकी स्थापना की। (जो कीर्ति स्वयं अपने आश्रयतकका दान कर सके वह उदार है।) अन्तमें श्रीहरिने अपने कुलके संहार—उपसंहारकी इच्छा की; क्योंकि अब पृथ्वीका भार उतरनेमें इतना ही कार्य शेष रह गया था॥ १०॥

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