श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.10.18

एकादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

न देहिनां सुखं किंचिद् विद्यते विदुषामपि।

तथा च दुःखं मूढानां वृथाहंकरणं परम्॥ १८

na dehināṃ sukhaṃ kiṃcid vidyate viduṣāmapi|

tathā ca duḥkhaṃ mūḍhānāṃ vṛthāhaṃkaraṇaṃ param|| 18

अर्थ

(यदि यह कहा जाय कि जो भलीभाँति कर्म करना जानते हैं, वे सुखी रहते हैं, और जो नहीं जानते उन्हें दुःख भोगना पड़ता है तो यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि) ऐसा देखा जाता है कि बड़े-बड़े कर्मकुशल विद्वानोंको भी कुछ सुख नहीं मिलता और मूढ़ोंका भी कभी दुःखसे पाला नहीं पड़ता। इसलिये जो लोग अपनी बुद्धि या कर्मसे सुख पानेका घमंड करते हैं, उनका वह अभिमान व्यर्थ है॥ १८॥

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