श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.11.10

एकादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

दैवाधीने शरीरेऽस्मिन् गुणभाव्येन कर्मणा।

वर्तमानोऽबुधस्तत्र कर्तास्मीति निबद्ध्यते॥ १०

daivādhīne śarīre'smin guṇabhāvyena karmaṇā|

vartamāno'budhastatra kartāsmīti nibaddhyate|| 10

अर्थ

यह शरीर प्रारब्धके अधीन है। इससे शारीरिक और मानसिक जितने भी कर्म होते हैं, सब गुणोंकी प्रेरणासे ही होते हैं। अज्ञानी पुरुष झूठमूठ अपनेको उन ग्रहण-त्याग आदि कर्मोंका कर्ता मान बैठता है और इसी अभिमानके कारण वह बँध जाता है॥ १०॥✎ 905 1742

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #905 शब्दोंके बीचका स्थान: है,वह → है, वह
  • #1742 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्थूल-शरीरमें → स्थूलशरीरमें

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