श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.11.8

एकादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

देहस्थोऽपि न देहस्थो विद्वान् स्वप्नाद् यथोत्थितः।

अदेहस्थोऽपि देहस्थः कुमतिः स्वप्नदृग् यथा॥ ८

dehastho'pi na dehastho vidvān svapnād yathotthitaḥ|

adehastho'pi dehasthaḥ kumatiḥ svapnadṛg yathā|| 8

अर्थ

प्यारे उद्धव! ज्ञानसम्पन्‍न पुरुष भी मुक्त ही है; जैसे स्वप्न टूट जानेपर जगा हुआ पुरुष स्वप्नके स्मर्यमाण शरीरसे कोई सम्बन्ध नहीं रखता, वैसे ही ज्ञानी पुरुष सूक्ष्म और स्थूलशरीरमें रहनेपर भी उनसे किसी प्रकारका सम्बन्ध नहीं रखता, परन्तु अज्ञानी पुरुष वास्तवमें शरीरसे कोई सम्बन्ध न रखनेपर भी अज्ञानके कारण शरीरमें ही स्थित रहता है, जैसे स्वप्न देखनेवाला पुरुष स्वप्न देखते समय स्वाप्निक शरीरमें बँध जाता है॥ ८॥✎ 905 1742

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #905 शब्दोंके बीचका स्थान: है,वह → है, वह
  • #1742 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्थूल-शरीरमें → स्थूलशरीरमें

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