श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.12.14

एकादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

तस्मात्त्वमुद्धवोत्सृज्य चोदनां प्रतिचोदनाम्।

प्रवृत्तं च निवृत्तं च श्रोतव्यं श्रुतमेव च॥ १४

tasmāttvamuddhavotsṛjya codanāṃ praticodanām|

pravṛttaṃ ca nivṛttaṃ ca śrotavyaṃ śrutameva ca|| 14

अर्थ

इसलिये उद्धव! तुम श्रुति-स्मृति, विधि-निषेध, प्रवृत्ति-निवृत्ति और सुननेयोग्य तथा सुने हुए विषयका भी परित्याग करके सर्वत्र मेरी ही भावना करते हुए समस्त प्राणियोंके आत्मस्वरूप मुझ एककी ही शरण सम्पूर्ण रूपसे ग्रहण करो; क्योंकि मेरी शरणमें आ जानेसे तुम सर्वथा निर्भय हो जाओगे॥ १४-१५॥

यह अर्थ श्लोक 14–15 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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