श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.12.20

एकादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

अयं हि जीवस्त्रिवृदब्जयोनि-

रव्यक्त एको वयसा स आद्यः।

विश्‍लिष्टशक्तिर्बहुधेव भाति

बीजानि योनिं प्रतिपद्य यद्वत्॥ २०

ayaṃ hi jīvastrivṛdabjayoni-

ravyakta eko vayasā sa ādyaḥ|

viśliṣṭaśaktirbahudheva bhāti

bījāni yoniṃ pratipadya yadvat|| 20

अर्थ

यह सबको जीवित करनेवाला परमेश्‍वर ही इस त्रिगुणमय ब्रह्माण्ड-कमलका कारण है। यह आदि-पुरुष पहले एक और अव्यक्त था। जैसे उपजाऊ खेतमें बोया हुआ बीज शाखा-पत्र-पुष्पादि अनेक रूप धारण कर लेता है, वैसे ही कालगतिसे मायाका आश्रय लेकर शक्ति-विभाजनके द्वारा परमेश्‍वर ही अनेक रूपोंमें प्रतीत होने लगता है॥ २०॥

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