श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.12.23

एकादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

अदन्ति चैकं फलमस्य गृध्रा

ग्रामेचरा एकमरण्यवासाः।

हंसा य एकं बहुरूपमिज्यै-

र्मायामयं वेद स वेद वेदम्॥ २३

adanti caikaṃ phalamasya gṛdhrā

grāmecarā ekamaraṇyavāsāḥ|

haṃsā ya ekaṃ bahurūpamijyai-

rmāyāmayaṃ veda sa veda vedam|| 23

अर्थ

जो गृहस्थ शब्द-रूप-रस आदि विषयोंमें फँसे हुए हैं, वे कामनासे भरे हुए होनेके कारण गीधके समान हैं। वे इस वृक्षका दुःखरूप फल भोगते हैं, क्योंकि वे अनेक प्रकारके कर्मोंके बन्धनमें फँसे रहते हैं। जो अरण्यवासी परमहंस विषयोंसे विरक्त हैं, वे इस वृक्षमें राजहंसके समान हैं और वे इसका सुखरूप फल भोगते हैं। प्रिय उद्धव! वास्तवमें मैं एक ही हूँ। यह मेरा जो अनेकों प्रकारका रूप है, वह तो केवल मायामय है। जो इस बातको गुरुओंके द्वारा समझ लेता है, वही वास्तवमें समस्त वेदोंका रहस्य जानता है॥ २३॥

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