श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.13.28

एकादश स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

यर्हि संसृतिबन्धोऽयमात्मनो गुणवृत्तिदः।

मयि तुर्ये स्थितो जह्यात् त्यागस्तद् गुणचेतसाम्॥ २८

yarhi saṃsṛtibandho'yamātmano guṇavṛttidaḥ|

mayi turye sthito jahyāt tyāgastad guṇacetasām|| 28

अर्थ

क्योंकि बुद्धि-वृत्तियोंके द्वारा होनेवाला यह बन्धन ही आत्मामें त्रिगुणमयी वृत्तियोंका दान करता है। इसलिये तीनों अवस्थाओंसे विलक्षण और उनमें अनुगत मुझ तुरीय तत्त्वमें स्थित होकर इस बुद्धिके बन्धनका परित्याग कर दे। तब विषय और चित्त दोनोंका युगपत् त्याग हो जाता है॥ २८॥

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